[दीवान]राजश्री की बर्खास्तगी को रद्द किया जाना क्यों जरूरी है ?

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Sat Feb 18 04:34:26 CST 2017


जोधपुर का जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय पिछले कुछ दिनों से चर्चा में है। दो
फरवरी को विश्वविद्यालय में संपन्न हुए सम्मलेन "हिस्ट्री रेकॉन्स्ट्रूड थ्रू
लिटरेचर : नेशन, आइडेंटिटी एंड कल्चर " के साथ ही, इस सम्मेलन के आयोजकों और
इसमें 'रिसोर्स पर्सन' की हैसियत से भागीदारी करने वाली प्रो निवेदिता मेनन के
ख़िलाफ़ एक सुचिंतित योजना के तहत हमले का दौर देखने में आया है।

इन हमलों में न सिर्फ, जैसा प्रो निवेदिता मेनन के पिछले दिनों स्क्रॉल पर
लिखे एक लेख से भी जाहिर हुआ, स्थानिय अख़बारों की बड़ी भारी भूमिका रही है।
बल्कि, पूरे कार्यक्रम को महज निवेदिता मेनन केंद्रित बनाने में संघ-भाजपा के
कुछ घोषित समर्थकों और छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने भी बड़ी
सफलता पायी है।

इस सफलता का यूं तो कोई विशेष महत्त्व नहीं दिखता। लेकिन ऐसी कोशिश के पीछे एक
साफ समझ जरूर दिखती है। यह तो निर्विवाद है कि विश्वविद्यालय की संकल्पना एक
ऐसे शैक्षणिक केंद्र की सोच से जुडी है, जहाँ इंसान बौद्धिकता के पैमानों पर
यथार्थ की परख करता  है। और मौजूदा चुनौतियों का तार्किक विश्लेषण करते हुए
आने वाले दौर में पहले से ज्यादा बेहतर समाज कैसे बने ऐसी चिंताओं से जूझने
की भी कोशिश यहाँ होती है। लेकिन हम यहाँ यदि हर तरह की आलोचना और सवालों से
बच कर सिर्फ जज्बात की रौ में ही बहने और बहाने का फैसला कर लें, तो एक समाज
और राष्ट्र के रूप में हमारे भविष्य की नैया मुमकिन है, हालात के थपेड़े में
तैरती तो रहे, लेकिन फिर इसका किसी पार लगना एक चमत्कार जैसा ही हो सकता है।

अब अगर राजश्री जैसी अध्यापिका ने एक शैक्षणिक आयोजन के जरिये अलग-अलग
धाराओं के बौद्धिकों को एक मंच पर लाने और इस तरह से जोधपुर विश्वविद्यालय में
पढ़ने वाले छात्र -छात्राओं को इन सब से परिचय का एक मौका दिया, तो इस के लिए
उनकी बर्खास्तगी कूप मंडूकता की ही संस्कृति को बढ़ावा देगी। ऐसी कूप मंडूकता
जहाँ भारत राष्ट्र के निर्माण की चुनौती शायद पहले से ही हल की जा चुकी है। और
राष्ट्र निर्माण की एक  'सर्वस्वीकृत' परियोजना पर अब विश्वविद्यालयों के
अहाते में न तो किसी सवाल-जवाब की आगे कोई जरूरत है, और न ऐसा करने की आजादी!

वैसे, संघ-भाजपा के दुर्दांत बौद्धिक शायद यह भूल जाते हैं कि इंसान सिर्फ
जज्बात और नारों के सहारे ही नहीं चल सकता। जैसे वो सिर्फ बौद्धिकता के सहारे
भी नहीं चल सकता। दोनों की ही संतुलित जरूरत इंसान को लगातार होती है। बौद्धिक
केंद्रों को नष्ट करना और सवाल करने की संस्कृति पर पहरे लगाना संभव है इस समय
कुछ तात्कालिक लाभ दे जाए। लेकिन स्वस्थ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को यह
बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी।
इस लिए भी राजश्री जैसी अध्यापिका की बर्खास्तगी को रद्द करना जरूरी लगता
है।और निवेदिता मेनन जैसे बौद्धिकों के सवाल और आलोचना का जवाब उन पर गाहे
बगाहे किया जाने वाला हमला तो कत्तई नहीं हो सकता।

*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
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