[दीवान]समाज में संवैधानिक मूल्यों की प्रतिष्ठा का प्रश्न

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Fri Nov 27 10:34:01 CST 2015


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज संसद के अपने एक उल्लेखनीय संबोधन में कहा कि
बाबा साहब डॉ अंबेडकर ने सारा जहर पीया, हमारे लिए अमृत छोड़ गए। संविधान पर हो
रही चर्चा के दौरान मोदी जी ने यह बात कही। उल्लेखनीय है कि इसके पहले गृह
मंत्री ने भी अपने संबोधन में डॉ अंबेडकर का उदाहरण रखते हुए यह कहा था कि,
'देश के संविधान की रचना करने वाले डॉ भीमराव अंबेडकर को बहुत अपमान का सामना
करना पड़ा। आहत मन होने के बाद भी उन्होंने कभी नहीं सोचा कि मैं भारत छोड़ कर
दूसरे देश चला जाऊं।' संसदीय चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने
जिस तरह से डॉ अंबेडकर के विराट व्यक्तित्व और संविधान निर्माण में उनके
अतुलनीय योगदान को अपने वक्तव्यों के माध्यम से सराहा है उसके लिए हम उनके
आभारी हैं। लेकिन आस-पास नजर डालते हुए जब हम अपने रोजमर्रा के जीवन
में उन्हीं संवैधानिक मूल्यों को तार-तार होता देखते हैं, जिनकी प्रतिष्ठा के
लिए डॉ अंबेडकर ने आखिरी दम तक संघर्ष किया, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि
हमारे सामाजिक जीवन में स्वतंत्रता, समता और न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों की
बहाली और सुरक्षा कैसे हो सकती है?
अब हरियाणा के हिसार में मुजादपुर की हालिया घटना को ही लें। एक दलित व्यक्ति
के घर में घुस कर उसके मुंह में जबरिया गोबर ठूसने और उसकी बेटी के साथ
भी मारपीट करने की निंदनीय घटना अगर सच है तो क्या यह हमारे लिए विचारणीय नहीं
? यह एक स्थापित तथ्य है कि दलित उत्पीड़न के मामलों में नरमी के बजाय तेजी का
ही रुख दिखाई देता है। एक अनुमान के मुताबिक हर 18 मिनट में एक दलित भेदभाव का
शिकार होता है। हर हफ्ते 6 दलितों का अपहरण होता है या उनको अगवा कर लिया जाता
है। प्रतिदिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना होती है। हर हफ्ते 13
दलितों की हत्या कर दी जाती है। और दलित उत्पीड़न के लगभग 27 मामले रोज सामने
आते हैं।ऐसे हालात में समरसता के उपदेश भर काफी नहीं हो सकते। भले ही ये उपदेश
सुनने और कहने में बड़े मीठे जान पड़ते हों। समरसता के उपदेश वास्तव में तब तक
निष्प्रभावी और बेमानी साबित होंगे जब तक कि दलित मानवाधिकारों को दूसरे तमाम
संवैधानिक मूल्यों के साथ ही हमने अपने सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा न बना
लिया हो। यह काम आसान नहीं है। और इसके लिए पहली आवश्यकता तो जाति आधारित शोषण
और उत्पीड़न को एक हकीकत के रूप में स्वीकार करना है। हिन्दुत्ववादियों और उनके
असर में आये व्यक्तिओं की सबसे बड़ी परेशानी तो यह है कि वो, बजाय संवैधानिक
मूल्यों की समाज में प्रतिष्ठा करने के, सिर्फ समरसता के उपदेशों से जाति के
उन्मूलन का स्वप्न देखते हैं। इसके उलट मैं समझता हूँ कि जब तक कुछ खास पेशों
और पदों से विशेष-विशेष जातियों की सम्बद्धता नहीं टूटती, डॉ अंबेडकर का
क्रांतिकारी अभियान पूरा नहीं होने पायेगा। संविधान की वास्तविक सफलता बाबा
साहब के गुणगान से थोड़ा ज्यादा की अपेक्षा करती है। और वह है संवैधानिक
मूल्यों की हमारे सामाजिक जीवन में पूर्ण प्रतिष्ठा। वर्ना, ब्राह्मणवाद के
सौभाग्य से, डॉ अंबेडकर की प्रतिमा पूजने और इसके एवज में चढ़ावा लेने के काम
में तो उदित राज जी से लेकर राम विलास तक अनेक 'अम्बेडकरवादी' पुरोहित अच्छे
से ही मुब्तिला हैं।
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