[दीवान]टीपू सुल्तान की असली छवि का प्रश्न

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Tue Nov 10 19:34:18 CST 2015


सिद्दरमैया सरकार द्वारा 18 वीं सदी मैसूर के मशहूर शासक टीपू सुल्तान की
जयंती मनाने का फैसला अप्रत्याशित रूप से सुर्ख़ियों में आ गया है। 10 नवंबर
2015 को टीपू सुल्तान जयंती समारोह आयोजित करने के फैसले का राष्ट्रीय स्तर पर
चर्चा के केंद्र में आना भी बेवजह नहीं है। वैसे तो राज्य की कांग्रेस सरकार
के नजरिये से टीपू जैसे देशभक्त, जिसने अंग्रेजों के खिलाफ तीन ऐतिहासिक युद्ध
लड़े और खुद शहादत पायी, की याद में कार्यक्रम आयोजित किया जाना पूरी तरह
से जायज लगता है। लेकिन राज्य सरकार द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के पहले ही कई
तरफ से विरोध के प्रबल स्वर भी उठने लगे थे। वास्तव में, कुर्ग, मंगलौर और
केरल के भी कुछ हिस्सों से लोग राज्य सरकार द्वारा टीपू को 'सेक्युलर' नायक
के रूप में स्वीकारे जाने के पक्ष में नहीं हैं। इनका मानना है कि टीपू
सेक्युलर होने के बजाय एक ऐसा क्रूर मुस्लिम शासक था जिसने बड़े पैमाने पर
गैर-मुस्लिमों की हत्या के साथ ही, उनके धार्मिक स्थलों को तहस-नहस किया, और
लोगों को मुसलमान बनने पर भी विवश किया। यही वजह है कि कुर्ग में कई संगठनों
ने विरोध स्वरुप 10 नवंबर को काला दिवस मनाने का भी ऐलान कर रखा था। तब पहली
नजर में ये आभास होना अस्वाभाविक नहीं कि हिन्दुत्ववादी संगठनों ने भी इसे एक
बड़े राजनैतिक मौके की तरह ही भुनाने का प्रयास किया हो। हलांकि, इसका दुःखद
पक्ष विश्व हिन्दू परिषद से संबद्ध एक कार्यकर्त्ता सहित एक अन्य
अनाम व्यक्ति की मृत्यु के रूप में सामने आया है। इन दोनों की मृत्यु निश्चित
रूप से अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। साथ ही टीपू सुल्तान के 'सेक्युलर' नायकत्व
के पक्ष और विपक्ष में जारी हिंसक प्रदर्शनों और तद्जनित ताजा दुर्घटना ने इस
ऐतिहासिक शासक के वास्तविक चरित्र पर बहस-मुबाहिसे की आवश्यकता को नए सिरे
से रेखांकित कर दिया है।

         इस सिलसिले में तब किसी गंभीर विश्लेषण या तर्कसंगत नतीजे पर
भी पहुँचने के लिए अव्वल तो हमें यह बुनियादी बात समझनी होगी कि  दूसरे
कई ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की ही तरह 'मैसूर के बाघ' की भी एकाधिक छवियाँ अतीत
से वर्तमान में लगभग झांकती हुई हमारे समक्ष अवलोकन के लिए मौजूद हैं। और यही
वो मूल वजह है जिसके चलते हम और आप इस तरह के सवालों, मसलन टीपू वास्तव में
'धर्मांध' था या 'सेक्युलर' (?), से टकराने को विवश हैं। साथ ही उपलब्ध
छवियों, तथ्यों और संबंधित श्रोतों के ऐतिहासिक प्रणाली सम्मत विश्लेषण
के आधार पर ही हम किसी अंतिम नतीजे पर पहुँचने का यहाँ महज एक प्रयास भर कर
सकते हैं। वैसे, दृष्टिकोण के भेद से कैसे नतीजों में भी भेद संभव है, इस
बेहद महत्वपूर्ण पक्ष को हमें बराबर मद्देनजर रखना होगा।
बहरहाल, टीपू सुल्तान की प्रचलित छवियों पर ज्यों ही हम पूरी शिद्दत से गौर
फरमाते हैं यह बात भी स्वतः स्पष्ट होने लगती है कि ये परस्पर विरोधी छवियाँ
दरअसल हमारा परिचय एक जटिल ऐतिहासिक व्यक्तित्व से करवाना चाहती हैं। मिसाल के
लिए, एक ओर जहाँ ब्रिटिश कालीन "मैसूर गजेटियर" या टीपू के एक दरबारी किरमानी
द्वारा लिखित तथा अब अंग्रेजी में अनूदित "हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान" के
चुनिंदा 'पाठ' से प्राप्त छवियों के जरिये अगर कुछ स्व-घोषित इतिहासकार हमारा
परिचय एक 'धर्मांध' किस्म की शख्सियत से करवाते है। तो वहीँ दूसरी तरफ, विश्व
प्रसिद्ध श्रृंगेरी मठ के अपने दस्तावेज इसी मुस्लिम शासक की एक अत्यंत उदार
छवि से भी हमारा परिचय कराते हैं। मतलब एक ऐसे शासकीय व्यक्तित्व से जिसने
मराठो के हमले से क्षतिग्रस्त हुए मंदिरों का न सिर्फ जीर्णोद्धार करवाया
बल्कि उनके व्यवस्थित रख -रखाव के लिए एक निश्चित अनुदान भी नियत करने का
फैसला किया। अब आप खुद ये महसूस कर सकते हैं कि इन परस्पर विरोधी छवियों से
किसी किस्म के नतीजे निकालने के लिए हमें थोड़ा और गहरी पड़ताल की आवश्यकता
पड़ेगी। और तब यहीं से इतिहास के गंभीर और सचेत अध्येताओं की भूमिका महत्वपूर्ण
हो जाती है। मेरा मानना है कि अपनी सटीक व्याख्या के जरिये एक समर्थ इतिहासकार
ऐसे मामलों में किसी निष्कर्ष तक पहुँचने में हमारी काफी मदद कर सकता है। कहना
नहीं होगा कि अब तक अनेकों हिंदुस्तानी और विदेशी इतिहासकारों ने, कम से कम 18
वीं सदी के राजनैतिक इतिहास पर रौशनी डालने के क्रम में, टीपू सुल्तान जैसे
विख्यात शख्स पर भी अपने विचार व्यक्त किये हैं। फिर क्या कोई भी ऐतिहासिक
व्याख्या हमें टीपू सुल्तान के वास्तविक चरित्र से भेंटने में सहयोगी या
उपयुक्त साबित होगी ?
फ़िलहाल उपरोक्त बहस में सीधे न उतरते हुए अगर हम मौजूदा विवाद के तात्कालिक
सन्दर्भ पर भी अपना कुछ ध्यान केंद्रित कर सकें तो यह भी पर्याप्त
फलप्रद साबित होगा। मशहूर कन्नड़ अभिनेता और नाटककार गिरिश कर्नाड ने टीपू
सुल्तान की जयंती पर राज्य व्यापी समारोह के दौरान अपने एक बयान में
कहा कि, "मैं महसूस करता हूँ कि अगर टीपू सुल्तान मुस्लिम नहीं हिन्दू होते तो
उन्हें कर्नाटक में वही दर्जा मिलता जो महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज को
प्राप्त है।" इस मौके पर कर्नाड ने देवनहल्ली के बंगलुरु अंतर्राष्ट्रीय हवाई
अड्डे का नाम केमपेगौडा के बदले टीपू सुल्तान के नाम पर रखने का भी प्रस्ताव
इस मजबूत तर्क के साथ किया कि केमपेगौडा न तो कोई स्वतंत्रता संग्राम
सेनानी थे और न ही देवनहल्ली टीपू की तरह उनका जन्म-स्थान है। इसके
बाद अपने सीधे हमले में भाजपा ने कर्नाड पर ऐसे मुद्दे के लिए बेंगलुरु के
संस्थापक (केमपेगौडा ) का अपमान करने का आरोप लगाया जो वास्तव में एक "बंद
अध्याय " है। लेकिन कर्नाटक या देश की वर्तमान राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला
कोई भी शख्स इस बेहद संजीदा मामले को "बंद अध्याय " तो शायद ही माने !
 दरअसल यह कोई पहला मौका नहीं जब टीपू सुल्तान की वास्तविक छवि के प्रश्न
पर कर्नाटका की पूरी राजनीति ध्रुवीकृत होती दिख रही है। इससे पहले 65 वें
गणतंत्र दिवस समारोह (2014) के दौरान कर्नाटक की झाँकी में टीपू सुल्तान को
उनकी ऐतिहासिक तलवार के साथ प्रस्तुत करने को ले कर भी अच्छा -खासा बावेला खड़ा
हो गया था। 2013 में भी जब केंद्र के अल्पसंख्यक मंत्रालय की ओर
से श्रीरंगपट्नम में टीपू सुल्तान विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव कर्नाटक
सरकार के समक्ष रखा गया तो राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री सी.टी.रवि ने
उस प्रस्ताव को यह कहते हुए सिरे से ख़ारिज करने का काम किया कि अंग्रजों की ही
तरह टीपू सुल्तान भी हमारे लिए विदेशी है और हमें उसका नाम एकदम
स्वीकार्य नहीं है। इसके भी पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से
जुड़े डी.एच.शंकरमूर्ति, तब जब कि वे भाजपा और जद (एस) की साझा सरकार में उच्च
शिक्षा मंत्री थे, कन्नड़- भाषा -विरोधी होने का बेहूदा आरोप लगाते हुए टीपू
सुल्तान को इतिहास के पूरे पाठ्यक्रम से ही बेदखल करने का कुचक्र रच रहे थे।
सनद रहे कि श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य को टीपू सुल्तान द्वारा लिखे तीस से भी
ज्यादा पत्र, जो फ़िलहाल मैसूर राज्य पुरातत्व विभाग के पास सुरक्षित हैं,
केवल कन्नड़ वर्णमाला का ही प्रयोग करते हुए लिखे गए थे।
इस पर इन्तेहाँ ये कि संदीप बालकृष्ण जैसे स्व घोषित इतिहासकारों, जिनकी अपनी
प्रेरणा के श्रोत पूरी तरह से शंकरमूर्ति जैसे संघी राजनेता हैं, को आज टीपू
विशेषज्ञ के रूप में पेश किया जा रहा है (देखें, *फर्स्ट पोस्ट* में एम.ए.
देवीअह का लेख)। हमारी नजरों के सामने ही देवीअह जैसे पत्रकार '*टीपू सुल्तान*,
*द टीरांत ऑफ मैसूर ' *के लेखक संदीप बालकृष्ण का हवाला एक मूर्धन्य इतिहासकार
के तौर पर देते नहीं अघा रहे हैं। और बालकृष्ण जैसे तथाकथित इतिहासकारों
की सांप्रदायिक इतिहास दृष्टि फिर पाठकों को यह समझाने का प्रयास करती दिखती
है कि टीपू सुल्तान द्वारा श्रृंगेरी मठ को दिये गये उपहारों का एकमात्र
मकसद "हिन्दुओं" के संभावित विद्रोह को रोकना भर था। और, तीसरे आंग्ल-मैसूर
युद्ध (1791) की पराजय के अलावा मराठों की बढ़ती शक्ति के प्रभाव से उपजी
घबराहट ने भी टीपू को यह एहतियाती कदम उठाने पर विवश किया ।
हलांकि ऐसी सांप्रदायिक इतिहास दृष्टि की सीमा उस समय पूरी तरह उजागर हो
जाती है जब, मिसाल के लिए, हम हैदराबाद निजाम जैसी एक क्षेत्रीय
मुस्लिम शक्ति के साथ टीपू के निरंतर तनावपूर्ण संबंधों पर गंभीरता से विचार
करने का प्रयास करते हैं। टीपू तब हमारे सामने एक ऐसी शख्सियत के बतौर उभरता
है जिसने, ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुकाबले के क्रम में,  राज्य- विस्तार और
संगठित केन्द्रीयकरण के लिए न केवल विधर्मी बल्कि अपने सधर्मी विरोधियों या
विद्रोहियों पर भी रवायत-ए -दौर के अनुरूप ही ज्यादतियां कीं।     अंत में,
ऐसे तमाम संघी इतिहासकारों, जो विशेषकर मार्क्सवादी इतिहास लेखन की धारा को
इसके 'नकार' और ' विरूपण' के लिए सवालों के दायरे में खड़ा देखना चाहते हैं,
को खुद अपनी व्याख्याओं को भी समान दोष से मुक्त रखने का कुछ तो अभ्यास अब
अवश्य प्रारंभ करना चाहिए। वर्ना हमें यह कौन बताएगा कि शहादत के समय
उस 'धर्मांध' टीपू की ऊँगली में ये "राम" नाम की मुंदरी भला क्या कर रही थी ?

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