[दीवान]कुछ सवाल तो अपने न्यूज चैनल/ अखबार से भी तो कीजिए

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Wed Nov 4 12:43:37 CST 2015


अपने न्यूज चैनल पर आखिरी बार आपने किसी किताब की चर्चा, किसी लेखक का रचना
पाठ, पुरस्कार-सम्मान के मिलने की खबर कब देखी थी ? आपके किस लेखक को विदेश की
किस संस्था,यूनिवर्सिटी, साहित्यिक समारोह ने रचना-पाठ के लिए बुलाया, इसके
बारे में आपको चैनल ने आखिरी बार कब खबर दी थी, ये सवाल आप खुद से या चैनल से
कभी पूछ सकते हैं ?

आप उनसे ये सवाल पूछ सकते हैं कि आप वैसे तो लिटरेचर फेस्टिवल के मुख्य
प्रायोजक होते हो, साहित्यिक समारोह भी कराते हो, पूरे शहर को बैनर,पोस्ट
होर्डिंग्स से इस कदर पाट देते हो कि उतने विज्ञापन तो ओटोमोबाईल, बनियान और
मोबाईल सेवा कंपनियां भी नहीं करतीं लेकिन इसके बाद साहित्य,लेखक और किताब के
बारे में एक लाइन की खबर दिखाना क्यों जरूरी नहीं समझते ?

आप अपने चैनल-अखबार से ये सवाल कर सकते हैं कि सरकार और कार्पोरेट के
साहित्यिक आयोजन के मीडिया पार्टनर, पीआर एजेंसियों की कठपुतली बनकर, लाखों के
विज्ञापन लेकर लोगों से इस आयोजन को सफल बनाने की गुहार लगाते हो लेकिन जब आप
सालभर तक इससे जुड़ी कोई खबर, कार्यक्रम यानी पाठक-दर्शक बनाने का काम करते ही
नहीं तो किस उम्मीद से तीन-चाप दिनों के लिए बाकी काम छोड़, इसमें डूब जाने की
उम्मीद रखते हो ?

आप चैनल-अखबार के संपादक से कभी ये सवाल करेंगे कि जो साहित्य, किताब की
दुनिया आपके लिए आज से पन्द्रह साल पहले ही मर चुकी थी..न तो आप किताबें पढ़ना
पसंद करते थे और न ही इस पर किसी तरह की खबरें प्रसारित करना जरूरी समझते थे,
आज सिर्फ इसलिए प्राइम टाइम मटीरियल हो गया कि इसमे सास-बहू सीरियलों का
मेलोड्रामा है, पुरस्कार लौटाने, उस लौटाने के विरोध में बाइट देने, फिर उसे
खारिज करने में कॉमेडी शो का एलिमेंट नजर आता है ?

आप अपने एंकर से कभी सवाल कर सकेंगे कि आप जब ये चुटकुले के अंदाज में कहते हो
कि इन लेखकों के बारे में साहित्य अकादमी विवाद से पहले ठीक से लोगों ने नाम
तक नहीं सुना था तो ये बताएं कि आपने आखिर बार कब उनका नाम लिया था ? इतनी
खबरों, घटनाओं के बीज आखिर बार कब आपको उनकी लिखी पंक्तियां ध्यान में आई थीं ?

आप अपने एंकर से ये सवाल कर सकेंगे कि साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने और उसके
विरोध करने के दोनों पक्ष के लेखक कहां हैं ? सम्मान लौटानेवालों की चर्चा
करने से देश की संस्कृति और जनभावना आहत होती है तो जो लौटाए जाने के विरोध
में हैं, लेखकों की उस जमात की बात को आप क्यों नहीं शामिल करते ? पिछले
पन्द्रह दिनों से भी ज्यादा चल रही बहस में लेखक आखिर इतना मजाक,उपहास उड़ाए
जानेवाला नागरिक कैसे बन गया ?

आखिर में आप चैनल से ये सवाल कर सकते हो कि आपने जिस तरह से अपनी बैलेंस शीट
को ध्यान में रखकर, उसे ही अंतिम सत्य मानकर साहित्य के लिए अलग से डस्टबिन की
व्यवस्था कर उसमे सब डम्प कर दिया, हमारी जिंदगी से साहित्य को पूरी तरह बेदखल
कर आखिर किस समाज की उम्मीद करते हो ? आखिर ऐसा क्यों है कि पुरस्कार वापस
करने के विरोध और पक्ष दोनों पर बात करनेवाले लोगों के बावजूद आपके जरिए एक ही
निष्कर्ष निकलकर आ रहा है कि इस समाज को लेखक की जरूरत नहीं है.

आप खुलकर ये कह सकते हो कि नहीं, लेखक की जरूरत तो हैं लेकिन ऐसे लेखक की
नहीं, ऐसे लेखक की जरूरत है. आप एक ऐसा शो कर सकते हो जिसमे ऐसे जरूरी लेखकों
की चर्चा और उनकी किताबों पर बातें शामिल हो ?

लेखक,साहित्यकार और लिखने-पढ़ने की दुनिया को लगभग कबाड़ घोषित कर देनेवाले
मीडिया से कुछ नहीं तो आप एक बार सवाल तो कर ही सकते हैं कि जो दुनिया और
जिसके लोग तुम्हारे लिए सालों पहले मर गए थे, उजड़ गई थी..उसे लेकर
महफिल-ए-प्राइम टाइम गुलजार करने के पीछे क्या सच में तुम्हारा सामाजिक सरोकार
शामिल है या फिर दस साल बाद फिर तुम्हें गढ्ढे में गिरे प्रिंस की तरह कोई
झुनझुना मिल गया है ?
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