[दीवान]यायावर दंपत्ति से एक मुलाकात

Ravikant ravikant at sarai.net
Mon May 11 00:59:01 CDT 2015


ब्रजेश,

एकाध मिसाल भी अटैच कर देते तो अच्छा होता।

रविकान्त

2015-05-08 14:47 GMT+05:30 brajesh kumar jha <jha.brajeshkumar at gmail.com>:

> *कला दीर्घा के पार भी एक बड़ी दुनिया है**: **मीनाक्षी-जे.सुशील*
>
> *ब्रजेश कुमार झा*
>
> मीनाक्षी-जे.सुशील की यायावरी व उनकी पेंटिंग के बीच विचित्र रिश्ता है। एक
> के बगैर दूसरा पूरा ही नहीं होता। वे रंग और कूची के साथ यायावरी पर निकलते
> हैं। वे मानते हैं कि कला दीर्घा के पार भी एक बड़ी दुनिया है, जो पेंटिंग्स
> की बारीकियों को समझती है। पढ़ें उनसे हुई बातचीत के खास अंश।
>
> *सवाल- आप दोनों के काम को अलग-अलग नजरिए से देखा-समझा जा रहा है। आपकी ही
> बात करुं तो आपने कहा कि **‘**समझ लीजिए कि यह हमारा पागलपन है।**’** आखिर
> यह पागलपन क्यों है**?*
>
> जवाब- आप इसे एक किस्म का जुनून कह सकते हैं। वैसे भी इस शब्द की परिभाषा
> संदर्भ के अनुसार बदल जाती है। एक संदर्भ तो यही है कि आम आदमी की समझ से जो
> चीज परे है, उसके लिए वही पागलपन है। हमारे ऊपर यही बात लागू होती है। मसलन-
> जब मैंने लंदन में पीएचडी करने का अवसर छोड़ दिया और कहा कि पेंटिंग करुंगी,
> तब लोगों ने कहा कि तुम पागल हो। यहां तक कि मेरे पिताजी ने भी यही बात कही।
> दरअसल, हमलोग एक प्रचलित अवधारणा से हटकर कुछ कर रहे हैं, तो लोग उसे अलग
> नजरिए से देखते हैं। हमारे लिए इस शब्द का इससे अधिक महत्व नहीं है।
>
>
>
> *सवाल- मीनाक्षी आपने आर्ट की पढ़ाई की है। पेंटिंग की दुनिया में आगे बढ़ने
> के आपके पास कई सरल रास्ते थे। जबकि जे. सुशील स्थापित पत्रकार हैं। अच्छा
> वेतन पाते हैं। आप दोनों बड़े आराम से पर्यटन के शौक को पूरा कर सकते थे। इसके
> बावजूद रंगों के साथ ऐसी यायावरी क्यों**?*
>
> जवाब- यह सच है कि हमारे पास आगे बढ़ने के सरल विकल्प थे, लेकिन वह हमारा शौक
> नहीं था। आर्ट की पढ़ाई करते हुए मैंने पाया कि चीजों को जटिल और गुंफित बनाकर
> प्रस्तुत करना लोगों को खूब भाता था, ताकि वे इस तथ्य को स्थापित कर सकें कि
> उनकी कला विशेष है। आम आदमी की समझ से परे कुछेक चुनिंदा लोगों के लिए है।
> हालांकि, भारत में कला आम लोगों के बीच से ही निकली है, लेकिन उसी लोक कला और
> कलाकार को हीन भावना से देखा जाने लगा है। यहां एक अलग किस्म का वातावरण बनाया
> गया है। वह यह कि पेंटिंग्स आर्ट संग्रहालयों में ही रहेंगे। वह बड़े-बड़े
> स्टूडियो में ही सजेंगे। आम आदमी इस समझ के साथ इससे दूर रहेगा कि यह तो उसकी
> समझ के बाहर की चीज है। सुपर एलीट क्लास के लिए है।
>
> लेकिन हमलोगों ने इस धारणा को तोड़ने की कोशिश की है। हमारा प्रयास है कि
> आर्ट को आम लोगों के बीच लेकर जाएं और अपनी पेंटिंग के माध्यम से इसे सरलतम
> रूप में रखें।
>
>
>
> *सवाल- कई बार ऐसा मालूम होता है कि आप लोग मधुबनी पेंटिंग कर रहे हैं। क्या
> यह सही है**?*
>
> जवाब- यह सच नहीं है। हमलोग मधुबनी पेंटिंग नहीं कर रहे हैं। बेशक कहीं-कहीं
> आपको उसके कुछेक तत्व दिखाई देंगे, लेकिन बारीकी से देखेंगे तो अनुभव करेंगे
> कि यह मधुबनी पेंटिंग से बिल्कुल भिन्न है। शायद यही वजह रही होगी कि मेरे
> पहले पेंटिंग शौ में लोगों ने कहा कि आप मधुबनी कला को बिगड़े स्वरूप में पेश
> कर रही हैं। खैर, यह उनका विचार था।
>
>
>
> *सवाल- फिर यह पेंटिंग का कौन सा रूप और रंग है**?*
>
> जवाब- आप यूं समझ लीजिए कि अपने-आप में यह उनमुक्त है। इसका कोई एक रूप-रंग,
> आकार-प्रकार नहीं है। हमलोगों ने अपनी यात्रा के दौरान कुंडापुर में समुद्री
> जीवन पर पेंटिंग की। एक जगह बुद्ध बनाया। महाभारत के चित्र भी उकेरने की कोशिश
> की। दरअसल, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमलोग उनके घर पेंटिग कर रहे हैं,
> वे क्या चाहते हैं और उनकी पसंद क्या है?
>
> हमारी पूरी कोशिश इस बात को लेकर होती है कि पेंटिंग से लोगों को सीधे-सीधे
> जोड़ा जाए। हालांकि, हम उन्हें पेंटिंग सिखाना या इसकी शिक्षा देना नहीं
> चाहते, बल्कि उनके और पेंटिंग के बीच सेतू का काम करने की कोशिश करते हैं।
> हमारा लक्ष्य होता है कि हम जिनके घर जाएं, वहां उनकी इच्छा और भावना को ध्यान
> में रखकर ऐसी पेंटिंग करें, जिसमें उनकी हिस्सेदारी अपनी इच्छा से हो। आपको
> जानकार आश्चर्य होगा कि हमलोगों ने अब तक जिन घरों में पेंटिंग बनाई है,
> उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन जब हम पेंटिंग बना रहे होते थे, तो वे
> उसमें अपनी कल्पना के रंग भरते जाते थे। राय देते थे। बारीक से बारीक चीजों पर
> उनकी नजर टिकती थी। यह देखकर हमारी धारणा पक्की हुई कि आम आदमी को भी कला और
> रंग की अच्छी समझ होती है। हमने केवल उनकी झिझक को तोड़ने का काम किया।
>
>
>
> *सवाल- क्या यह समझा जाए कि कला-दीर्धा को घर-घर पहुंचाने की कोशिश है**?*
>
> जवाब- आज पेंटिंग की दुनिया में अलग-अलग प्रयोग हो रहे हैं। हमारी कोशिश केवल
> इतनी है कि आम आदमी को यह बता समझा सकें कि उसके भीतर भी एक कलाकार छुपा है।
> हमारा मानना है कि एक महिला जो स्वादिष्ट भोजन बनाती है, वह बेहतरीन कलाकार
> है। उसे रंग, गंध और स्वाद की अच्छी समझ होती है। घर को करीने से रखना भी एक
> बड़ी कला है। इस दृष्टि से देखें तो हर घर कला-दीर्धा है। दरअसल, पेंटिंग को
> लेकर जो मिथक फैला हुआ है, हम उसे तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
>
>
>
> *सवाल- क्या पेंटिंग की ये शैली किसी लोक कला के करीब है**?*
>
> जवाब- हम इसे लोक कला तो नहीं कह सकते। हां, यह जरूर है कि हमलोग एक प्रयोग
> कर रहे हैं।
>
>
>
> *सवाल- आपने कई लोगों के घर गए, उन्हें पेंटिंग के लिए प्रेरित किया। यह
> अच्छी बात है। लेकिन, हर चीज का अपना तौर-तरीका होता है। पेंटिंग में लकीर
> खींचने या रंग भरने का महत्व है।* *क्या कोई ऐसा मिला जो इसके व्याकरण को
> समझता हो**?*
>
> जवाब- हमलोगों ने पेंटिंग्स को सही या गलत के खांचे में डालकर कभी देखा ही
> नहीं। यह हमारा उद्देश्य भी नहीं था। इन यात्राओं के दौरान पेंटिंग हमारे लिए
> उनके भीतर छुपी रचनात्मकता को बाहर लाने का मध्यम रही और हमलोग यही काम करते
> गए।
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