[दीवान]मराठी फ़िल्म 'किल्ला' पर...

Mihir Pandya miyaamihir at gmail.com
Tue Jun 30 08:11:41 CDT 2015


Dekhi nahin abhi tak. Naam note kar liya gaya hai ☺ Waise Drishyam ka Hindi
remake bhi aane waala hai. And it is shot by Killa's director - Avinash
Arun.

Duniya gol hai!
On 30 Jun 2015 07:03, "ravikant" <ravikant at sarai.net> wrote:

>
> Bahut khoob, dr. mihir. Jab gair hindi filmon Ki baat Nikali hai to ek
> sifarish meri taraf se bhi: Malayalam film drishyam zarur dekhein, jahan
> bhi mauqa mile. Isase aage kuchh Kehna Nahin chahie.
>
> Ravikant
>
>
> On 30-Jun-2015, at 2:16 am, Mihir Pandya <miyaamihir at gmail.com> wrote:
>
> *'किल्ला' पर*
>
>
> हर रचनाकार को अात्मकथा लिखना नसीब नहीं होता। लेकिन इनमें बहुत ऐसे भी हैं,
>> जिन्हें उसकी ज़रूरत नहीं महसूस होती। दरअसल इनकी अात्मकथाएं इनकी गल्प
>> रचनाअों के पोरों से रिसती हैं। *अविनाश अरुण* की 'किल्ला' ऐसी ही इक
>> अात्मकथात्मक अाभा वाली फ़िल्म है जिसे उन्होंने अपनी स्मृतियों के महीन धागों
>> से बुना है। फ़िल्म की रिलीज़ के हफ़्ते पहले 'मिंट' के उदय भाटिया को दिए
>> साक्षात्कार
>> <http://www.livemint.com/Leisure/9R8PcaT62Ev3VGHjXRgsoL/The-Making-of-Killa.html> में
>> वे इस बात का ज़िक्र करते हैं कि किस तरह स्वयं उनके बचपन की एक निर्णायक घटना
>> की याद, जब उनके ही किसी मित्र ने उन्हें पीछे से धक्का देकर अँधे कुएं में
>> धकेल दिया था, उनकी पहली फ़िल्म के मध्य अाए शायद सबसे विहंगम प्रसंग का उत्स
>> बनती है। लेकिन शायद इसी सुनहरे मोड़ पर जाकर उनकी यह निजी स्मृतियाँ सिनेमा
>> देखनेवाले की साझा स्मृतियों में बदल जाती हैं। अपनों की भीड़ में अकेला छूट
>> जाने का वह अादिम भय जिसे अाधुनिक नागर सभ्यता कभी हर नहीं पाई। भीतर के
>> मुलायम को किसी कोटर में बन्द कर लेने की अादत जो किसी अात्मीय द्वारा किए
>> विश्वासघात से उपजती है। स्मृतियाँ, भय, अादतें जिन्हें अाप हाथ बढ़ाकर छू
>> सकते हैं।
>
>
>> 'किल्ला' भी मैंने बीते साल अन्य मराठी फ़िल्म 'कोर्ट'
>> <http://www.jankipul.com/2015/04/blog-post_96.html> के साथ मैकलॉडगंज के
>> TIPA सभागार में *'धर्मशाला अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव'* के दौरान देखी
>> थी। यह फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ मराठी फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने से
>> पहले की बात थी। 'हंस' के लिए लिखे इस अालेख के बाद अौर इस शुक्रवार को फ़िल्म
>> की अखिल भारतीय रिलीज़ से पहले निर्देशक अविनाश अरुण अपने सीने पर कुछ अौर
>> गौरवशाली तमगे लटका चुके हैं। उनकी शूट की हुई फ़िल्म 'मसान' इस बीच कान
>> फ़िल्म फेस्टिवल के प्रतिष्ठित 'अन सर्टेन रिगार्ड' में चयनित हुई अौर
>> निर्देशक नीरज घायवान वहाँ से एक नहीं दो पुरस्कार अौर अनथक, असंख्य तालियों
>> की गड़गड़ाहट जीतकर लौटे। अविनाश के काम अौर उनकी निर्दोष निरंतरता को देखें
>> (सहायक के रूप में उनके खाते 'लुटेरा' अौर 'काय पो चे!' जैसी फ़िल्में हैं) तो
>> कहना न होगा कि हम हमारे दौर के सबसे संभावनाशील सिनेमैटोग्राफ़र के सबसे
>> बेहतरीन में बदलने की निर्माण प्रक्रिया को अपनी अाँखों के सामने साक्षात घटता
>> हुअा देख रहे हैं।
>
>
>
> दो हफ़्ते पहले एक छोटी सी चमत्कारी तमिल फ़िल्म 'काक्का मुत्ताई' ने अापका
>> मन भरमाया था। इस हफ़्ते यह बारी मराठी फ़िल्म 'किल्ला' की है। अगर यह फ़िल्म
>> अापके शहर में लगी है, तो इस सप्ताहांत इसे मौका दें। मेरा वादा है कि अाप
>> निराश नहीं होंगे।
>
>
> *'किल्ला'* देखना किसी रूठे हुए जिगरी दोस्त से सालों के अन्तराल के बाद
> मिलने की तरह है। इसमें उदासी भी है, उन बीते सालों की जब वक़्त हाथ से छूटता
> रहा अौर दोस्त की बेतरह याद अाती रही। इसमें बेचैनी भी है, उस पल को पकड़ लेने
> की चाहत जिसका सालों इन्तज़ार किया अौर अाज अचानक समयचक्र ने उसे सामने ला
> खड़ा किया है। इसमें ठहराव भी है, जब दौड़ती ज़िन्दगी में अचानक अासपास की
> दुनिया की तमाम गतिविधियाँ अापके लिए रुक जाती हैं अौर सब कुछ उसी पल में सिमट
> अाता है। अौर इन सबके ऊपर इसमें निस्संगता भी है, कि दोस्त के चले जाने से
> दोस्तियाँ नहीं जाया करतीं। कि ज़िन्दगी का नाम चलते रहने में है। 'किल्ला' की
> कोमलता मुझे भाषा में कविता कहने वाले, सदा मुंह में छालों वाले किसी पहाड़ी
> कवि की कविताअों की याद दिलाती है। यह उन फ़िल्मों की सूची में शामिल होगी
> जिसकी स्मृति को अाप फ़िल्म ख़त्म होने के बाद सिनेमाघर के अंधेरे में छोड़ने
> की बजाए किसी नवजात ख़रगोश के बच्चे की तरह नज़ाकत के साथ अपने सफ़री झोले में
> रख साथ घर ले जाना चाहेंगे।
>
>
> लड़कपन की दहलीज़ पर खड़ा चिन्मय (अर्चित देवधर) अपनी माँ के तबादले की वजह
> से 'बड़े शहर' पूना को छोड़ कोंकण के किसी छोटे से कस्बे में अाया है।
> 'किल्ला' की कथा हमें ग्यारह वर्षीय चिन्मय के जीवन संसार के भीतर ले जाती है।
> इसमें एक अोर है चिन्मय का अपनी कामकाजी माँ (अमृता सुभाष) से रिश्ता जहाँ
> पिता के असमय चले जाने की ख़ामोश उदासी घुली है, वहीं दूसरी अोर है कस्बे के
> स्कूल में चिन्मय के नए बने दोस्तों का संसार जहाँ बेपरवाह दिखती दोस्तियों
> में गहरे छिपी व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धाअों अौर रूठने-मनाने के अबोले दायरों के
> मध्य वह ज़िन्दगी के कुछ सबसे महत्वपूर्ण सबक सीखता है। बीती कुछ अन्य क्लासिक
> मराठी न्यू-वेव की फ़िल्मों की तरह (जिनमें सुजॉय दहाके की 'शाला', उमेश
> विनायक कुलकर्णी की 'विहीर' अौर हाल में चर्चित हुई नागराज मंजुले की
> 'फैंड्री' शामिल हैं) अविनाश अरुण की 'किल्ला' भी मुख्यधारा सिनेमा द्वारा
> अामतौर पर अनछुअा छोड़ दिये गए उमर के उस पड़ाव को टटोलती है जिसे
> हिन्दुस्तानी में 'किशोरवय' की दहलीज़ कहा जाता है। लेकिन इन्हें अाप फ़र्जी
> किस्म के भोलेपन के साथ बाँध दी गई 'बाल-फ़िल्म' की पूर्वनिर्धारित श्रेणी में
> डालने की ग़लती बिल्कुल ना करें। इस नए दौर के मराठी सिनेमा की यही ख़ास बात
> है कि यह फ़िल्में उमर के इस नाज़ुक पड़ाव को पकड़ते हुए इसकी जटिलताअों से
> बचने की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि उनका पूरा ईमानदारी से सामना करती हैं।
> चिन्मय के दोस्तों की अापसी प्रतिस्पर्धाएं अौर उनके बीच बदलते संबंधों के
> मध्य कहीं भी फ़िल्म इन किरदारों का एकायामी चित्रण नहीं करती। ना यहाँ क्लास
> का सबसे अमीर लड़का युवराज खल पात्र है अौर न बदमाशी में अव्वल बंड््या। कथा
> चिन्मय के चरित्र को केन्द्रीयता देने की कोशिश में किसी अन्य किशोर से अौर
> उसके निरंतर नवनिर्मित हो रहे अनुभव संसार से नाइंसाफ़ी नहीं करती। युवराज का
> किरदार, जो पहले चिन्मय का प्रतिद्वंद्वी अौर बाद में सबसे अच्छा दोस्त बन
> जाता है, इस भाव निष्पक्षता का सबसे बेहतर उदाहरण है।
>
>
> 'किल्ला' जितनी उसकी कथा में है, उससे कहीं ज़्यादा उसकी गतिमान तस्वीरों में
> है, उसकी ख़ामोश ध्वनियों में है। यह संवादों से ज़्यादा मौन से भावों की
> अभिव्यक्ति करती है। फ़िल्म के एक निर्णायक मोड़ पर जहाँ चिन्मय विकराल बरसात
> के मध्य किले के भीतर अकेला छूट गया है अौर अचानक उसके अवचेतन में बसे सारे डर
> उसे अपनी अाँखों के सामने जीवित दिखाई देने लगे हैं, वह चिल्लाता है। फ़िल्म
> यहाँ अद्भुत प्रयोग के चलते उसकी अावाज़ को मूसलाधार बरसात की घनीभूत ध्वनि के
> पीछे छिपे मौन में बदल देती है। इस प्रयोग की वजह से न सिर्फ़ हम उसके दोस्तों
> से अलग अकेला छूट जाने के तात्कालिक डर को जान पाते हैं, उसके अवचेतन में बसे
> पिता की मृत्यु से उपजे अकेलेपन से भी परिचित होते हैं। यहाँ कथा में मौजूद
> वास्तविक किला दरअसल अबोले की उन अभेद्द भावनात्मक दीवारों का प्रतीक है जिसे
> छोटा-बड़ा हर इंसान अपने दुख को 'अद्वितीय' समझ अपने मन के चारों अोर रच लेता
> है। 'किल्ला' देखते हुए उमेश विनायक कुलकर्णी की लघु फ़िल्म 'घिरणी' अौर उनकी
> बेहतरीन फीचर फ़िल्म 'विहीर' बेतरह याद अाती हैं। यहाँ यह तथ्य महत्वपूर्ण है
> कि अविनाश स्वयं उमेश कुलकर्णी के सहायक के तौर पर लम्बे समय तक काम कर चुके
> हैं। 'गिरणी' की तरह ही यहाँ भी किशोरवय कथानायक के पिता सिर्फ़ तस्वीर में
> मौजूद हैं अौर पिता की यह अनुपस्थिति यहाँ बड़े होते कथानायक के मनोभावों को
> रचने वाला महत्वपूर्ण कारक बन जाती है। कथा में चिन्मय के अपनी माँ से संबंधों
> की परतों को उघाढ़ने वाला वह प्रसंग महत्वपूर्ण है जहाँ समन्दर किनारे स्थित
> अंतिम लाइटहाइस की छत पर दोनों माँ-बेटे अनुपस्थित पिता को याद करते हैं। यहाँ
> चिन्मय द्वारा अाँखों में अाँसू भरे माँ का अाश्वस्तिदायक मुद्रा में पकड़ा
> हुअा हाथ बताता है कि कैसे अबोध उमर में पिता की मृत्यु से उपजे ख़ालीपन से
> जूझ रहा लड़का हमारे समाज में बचपन के पूरा बीतने से पहले ही 'बड़ा' हो जाता
> है।
>
>
> पावस के महीने में मूसलाधार बरसते बादलों के बीच अविनाश अरुण कोंकण को उसकी
> अनछुई काया में टटोलते हैं। एफ़टीअाईअाई के पढ़े अविनाश मूलत: सिनेमैटोग्राफर
> हैं अौर इससे पहले 'लुटेरा' जैसी अपने विज़ुअल के लिए सराही गई फ़िल्म के
> छायांकन पर काम कर चुके हैं। अविनाश अरुण अपनी फ़िल्म 'किल्ला' के
> सिनेमैटोग्राफर भी हैं। यहाँ अरुण किसी चित्रकार की तरह अपने फ्रेम गढ़ते हैं।
> समन्दर किनारे बसा यह ठहरा हुअा कस्बा बारिशों के बाद जैसे एक नई पोशाक पहनता
> है। यह समन्दर की लहर के लौटने के बाद रेत के कोरे किनारे पर पहला पैर रखने की
> तरह है। उन्होंने किरदारों की भीतरी उदासी को परदे पर फ़िल्माने के लिए इंडोर
> दृश्यों को लट्टू की सघन पीली रौशनी में फ़िल्माया है अौर इस उदास पीले का
> विलोम वे बरसात, समन्दर अौर अाकाश के अासमानी नीले के साथ अपने अाउटडोर
> दृश्यों में रचते हैं। पानी स्वयं यहाँ सबसे बड़ा मैटाफर है। पानी ही यहाँ
> बाँधता है अौर पानी ही यहाँ किरदारों को बंधनों से अाज़ाद कर देता है। स्वयं
> चिन्मय को उलझन के क्षणों में अनजान सहयात्री के साथ एक डगमग डोंगी पर की गई
> अनन्त अनिश्चित समन्दर की यात्रा अागे का रास्ता सुझाती है अौर निडर होकर अपने
> डरों का सामना करने का हौसला देती है। यहाँ किरदारों के मन का बोझ जब पक जाता
> है तो वे भरी बरसात में छाता 'भूलकर' निकल जाते हैं,  अौर मुझे चैप्लिन की कही
> वो बात याद अाती है जिसमें वे बरसात को अपना दोस्त बताते थे जो अाँखों से
> नमकीन पानी बनकर निकलते दुख को अपने अाँचल में छिपा लेती है।
>
>
> 'किल्ला' अात्मकथात्मक फ़िल्म है, लेकिन भिन्न क़िस्म से। यहाँ सिनेमा सिर्फ़
> बनानेवाले की अात्मकथा न होकर देखने वाले की ज़िन्दगी का अात्मकथात्मक अंश हो
> जाती है। यह फ़िल्म कथा है माँ के तबादले के चलते 'बड़े शहर' पूना से वापस
> कोंकण के किसी देहाती कस्बे में लौटने वाले ग्यारह साल के चिन्मय की। लेकिन
> इसे देखने वाले हम उसी देहात को छोड़ शहर के मेले में अा पहुँचे हैं। अौर ऐसे
> में 'किल्ला' हमारी किशोर स्मृतियों की कथा बन जाती है। लेकिन जो बात 'किल्ला'
> को नॉस्टेलजिया जगाने वाली अन्य भोली कथाअों से अलग अौर एक पायदान ऊपर लेकर
> जाती है वो इसका नॉस्टेल्जिया को मृत अतीत के पीछे छूटे हिस्से की तरह दुखी
> भाव से देखने का भाव नकार कर उसे गतिशील वर्तमान का हिस्सा बनाने की समझ। अपने
> अंतिम दृश्यों में 'किल्ला' धूप-छाँव के खेल वाले जिन गतिशील दृश्यों को रचती
> है, वह उसकी शुरुअाती चित्रात्मक भाषा से अलग है। चिन्मय मोह के भंवर में
> जितना गहरे उतरता है, उतना ही वो अाज़ाद होता चला जाता है। यह बात समझने में
> उसे थोड़ी देर लगती है,  शायद हमें भी। लेकिन ज़िन्दगी की गतिशीलता सदा चलते
> रहने में ही है, एक नॉस्टेल्जिया भरी मोहाविष्ट कथा होते हुए भी यह हासिल
> 'किल्ला' की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
> --
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