[दीवान]उन्हें रचना पढ़नी होती है या पीटीसी करनी होती है ?

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Jun 23 14:46:49 CDT 2015


साहित्य के प्रतिबद्ध सुधीजन अखबार, टीवी की भाषा की बाजारु कहकर भले ही
दिन-रात कोसें लेकिन खुद इंडिया टीवी के रास्ते पर चलने में गुरेज नहीं
करते..इन दिनों कार्यक्रमों के ऐसे-ऐसे नाम सुनने को मिलेंगे कि लगेगा प्राइम
टाइम बुलेटिन की टीजर चला रहे हों..खुले में रचना तो फिर किले में रचना और अब
ये मुद्राजी अपनों के बीच..जैसे अपनी रचना न पढ़नी हो, पीटीसी करनी हो..खैर,


<http://4.bp.blogspot.com/-gPoZwZJj7tg/VYm3VaW4n3I/AAAAAAAARa0/61eahwz97I8/s1600/Screen%2BShot%2B2015-06-24%2Bat%2B12.50.47%2Bam.png>
मेरी मुद्राराक्षसजी से कोई व्यक्तिगत जान-पहचान नहीं है लेकिन जनसत्ता के कॉलम
से उनको जानता हूं और जबरदस्त प्रशंसक हूं..बस एक बार आज से सात-आठ साल पहले
बुकफेयर में देखा..तब एमए-एमफिल् वाली हुलस थी..राहुल ने कहा- यही है
मुद्राराक्षस, चल चलते हैं मिलने..मैं जाकर पास में खड़ा हो गया..कुछ बोला
नहीं..मेरी तरह कुछ और हुलसिए आकर नमस्ते सर करने लगे..और देखा कि
मुद्राराक्षसजी उन सबसे और हमे भी नोटिस में लेते हुए बातचीत में रम गए..अब
तुमलोग कहा जाओगे पूछा और बढ़ने लगे..दस मिनट की मुलाकात में बेहद सहज,संजीदा
और अपने से लगे..मतलब मैं दावा कह सकता हूं कि वर्ल्ड बुक फेयर की उस धकमपेल
में भी अपनों के ही बीच थी और इसका एहसास उन्होंने खुद कराया..


इस तरह से वो बाकी लोगों से न भी मिले हों तो रचनाकार तो वैसे भी अपनों के ही
बीच हुआ करते हैं, पराये होते कौन हैं ? सत्ताधारी,चमचे, लंठ-लठैत..ऐसे में
माफ कीजिएगा, इस तरह के नाम के साथ कार्यक्रम करना मुझे कोई तर्क समझ न
आया..ये रचनाकार को आत्मीय बनाने के नाम पर वैचारिक स्तर पर तंग करना हुआ.
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