[दीवान]उनका अकेलापन जो इनबॉक्स में उतर आता है

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Jun 23 02:27:05 CDT 2015


आमतौर पर इनबॉक्स में मुझे कोई पहली बार हाय-हैलो करता है तो बड़े प्यार से
रिस्पांड करता हूं. वो कभी मीडिया कोर्स के बारे में जानना चाहते हैं, कभी
बीटेक किया है अब मास कॉम करना ठीक रहेगा क्या टाइप सलाह लेना चाहते हैं. कभी
किसी पोस्ट को लेकर बात करना चाहते हैं, कभी पता नहीं मेरे बारे में क्या राय
रखते हैं कि एकदम से पर्सनल बातें ये कहते हुए शेयर करने लग जाते हैं कि सिर्फ
आपको बता रहा हूं..ब्ला-ब्ला लेकिन
कोई ये सवाल करे कि आप तो रांची से हैं फिर इलाहाबाद वाले तिवारी जो कैसे
जानते हैं, आप तो दिल्ली में रहते तो भटिंडा की उस लेडी को कैसे जानते हैं ?
आप तो कहते हैं मीडिया का कोर्स कहीं से भी कर लो लेकिन फिर आपने खुद विद्या
भवन से किया, आपका आइआइएमसी में नहीं हुआ क्या ? आपको मैं अपना एक रिकॉर्ड
बताउं- मेरा सपना था डीयू में पढ़ने का, पूरा नहीं हुआ लेकिन मैंने जेएनयू से
पढ़े लोगों को बिठाकर पढ़ाया है. आपके बैचलर्स किचन में कोई आकर कब्जा कर ली
है क्या, कुछ अपडेट नहीं कर रहे.. बुरा मत मानिएगा, कुछ दिनों से देख रहा हूं
वो लड़की आपकी हर पोस्ट को लाइक कर रही है, आप भी करते हो..आपलोग एक-दूसरे को
कब से जानते हो ? मेरा मतलब है आपकी फ्रैंड है क्या ? कई बार हैरानी भी होती
है कि लोगों के पास इतनी बारीकी से नोटिस करने का समय होता है ? बस कहने को
वर्चुअल
स्पेस की खुली दुनिया. मोहल्लेवाली तांक-झांक और छिछोरापन यहां भी हावी है
.....मुझे आपसे ये सुनना है कि आप हैलो कैसे बोलते हो, आपको फोन कर सकती
हूं..आपको एक बात बताउं- आपकी वाइफ बहुत ऐश करेगी आपके साथ..ये तो अभी शादी के
चार साल ही हुए कि वैरागी हो गए( कुछ रोने-कलपनेवाले सिंबल साथ में)..विनीतजी,
अच्छा आपके घरवाले कुछ कहते नहीं कि इस तरह ओपनली लिख देते हो कि हौले-हौले
वाइन पी..मेरा मतलब है आपके घर भी तो रिश्ते आ रहे होंगे, कहीं बनते रिश्ते
बिगड़ न जाए...मैं तो कई बार घबरा ही जाती हूं सोचकर...मेरे तो ये तीन दिन
नागपुर क्या गए, दिन ही पहाड़ हो गया..मिली के स्कूल जाने के बाद तो मत
पूछिए..ये तो फेसबुक है कि आप जैसे लोगों का लिखे-पढ़े से दिन कट जाता है.

अच्छा आप भी पहले बिहारशरीफ रहते थे..मेरा ससुराल हुआ..बताइए..दुनहूं भाय का
एक ही जगह से नाता..आप जाते हैं कि नहीं ? जानते हैं भायजी आप दिल्ली रहें या
बम्बै..बिहारी न बिहारिए रहेगा..थोड़ा अलग लगेगा आपको, पर इंडिया में रहकर आप
बच नहीं सकते..इसको अदरवाइज मत लीजिएगा- इ बताइए कि आप औ रवीश एकै जात हैं या
कुमार लिखकै दुनहूं एक ही एजेंड़े पर चलते हैं कि सबको टाइटल देखके गरिआओ औ
अपने कुछ पता ही लगे दो ?

इन बातों का क्या जवाब दूं ? सबसे जयादा अफसोस तो इस बात का कि आप लिख-पढने
रहे हैं, चीजों पर कैसे सोच रहे हैं, बातचीत में कहीं शामिल नहीं. मुझे पता है
कि जो ये इस तरह से बातचीत शुरु करते हैं, आप करने लगें तो घंटों बीत
जाए...नहीं छोड़ेंगे..लेकिन मैं बस एक ही बात सोचता हूं ऐसे वक्त में कि आखिर
क्या है कि जिंदगी में ऐसा अकेलापन घेर लेता है कि ऐसा कोई नहीं मिलता जिसस
रोज मिलकर भी शेयर नहीं कर पाते और हम जैसे नितांत अजनबी, जो कभी भी अकाउंट
डिएक्टिवेट करके चला जाए, सब बताने लग जाते हैं..इनबॉक्स के इस संप्रदाय पर इन
दिनों मैं कई एंगिल से सोचने लगा हूं.. फेसबुक पर मौजूद कुछ लोग मुझे
गांव-देहात की पुलिया पर बैठे उनलोगों की तरह लगते हैं जो हाव-भाव से किसी का
इंतजार करते जान पड़ते हैं लेकिन इंसान तो इंसान गाय-बकरी तक गुजर जाए तो
इंतजार खत्म और उसी के साथ खुरपेंच शुरु. अजीब अकेलेपन की शिकार है ये फेसबुक
की इनबॉक्स दुनिया...एक मुझे ही चौबीस घंटे कम पड़ जाते हैं
जीने-खाने,चूल्हा-चाकी,टीवी-अखबार के बीच जूझते रहने में..
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