[दीवान]जिंदा जलाया गया तो एक को, धूं-धूं करके तो कई और जल रहे हैं

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Jun 22 09:31:34 CDT 2015


<http://1.bp.blogspot.com/-u5f8BNDgjFs/VYgbzdSzdsI/AAAAAAAARaQ/BNhW515talE/s1600/Screen%2BShot%2B2015-06-22%2Bat%2B7.52.02%2Bpm.png>













एक के बाद एक पत्रकारों की हत्या सिर्फ सत्ता और उसके आसपास की ताकतों की
क्रूरता को नहीं बल्कि मीडिया के भीतर के उस खोखलेपन को भी उजागर करती है जहां
खुद उसके लिए कोई जगह नहीं है..आप मीडिया संस्थानों में मीडियाकर्मी/पत्रकारों
के साथ होनोवाले व्यवहार पर गौर करेंगे तो अंदाजा लग जाएगा कि हत्या की जमीन
यहीं से तैयार होती है..अब मौत के बाद गत्ते पर नारे लिखकर, गले में प्रशासन
के खिलाफ मुर्दाबाद लिखकर टांग लें, कुछ खास बदलनेवाला नहीं..ऐसा इसलिए कि
मीडियाकर्मी जब तक काम कर रहा होता है, मीडिया का आदमी होता है, जब मुसीबत में
पड़ता है तो ये उसका पर्सनल मामला हो जाता है.. मैं मालिक बने पत्रकारों और
पत्रकारों के मालिक बन जाने की बात नहीं कर रहा.


दिन-रात सत्ता के खिलाफ दहाड़नेवाले चैनल अचानक से बंद हो जाते हैं, सैंकड़ों
मीडियाकर्मी सड़क पर आ जाते हैं, कुछ कुपोषण का शिकार होकर मर जाते हैं लेकिन
वो खुलकर लड़ते नहीं,इएमआई के शिकंजे में फंसे अधिकांश दूसरे चैनल/ मीडिया
संस्थान का रूख कर लेते हैं..जब वो अपने लिए नहीं लड़ते तो किसी दूसरे
मीडियाकर्मी के लिए क्या कर सकेंगे भला ? नतीजा, सब पर्सनल मैटर की लेबल लगाकर
निबटा दिया जाता है..आपको क्या लगता है जिन खनन माफिया के खिलाफ संदीप कोठारी
ने रिपोर्टिंग की, उसके बारे में सिर्फ उन्हें ही मालूम था बाकी सबसे तेज
दर्जनों चैनल महरुम थे..नहीं..फर्क सिर्फ इतना है कि बाकी के मीडियाकर्मी
पत्रकारिता और प्रबंधन की पत्रकारिता का फर्क समझते हैं..उन्हें रिपोर्टिंग और
प्रेस रिलीज में फर्क मालूम है. #‎मीडियामंडी
<https://www.facebook.com/hashtag/%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A5%80?source=feed_text&story_id=10206654016486772>
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