[दीवान]आलोचना और भारतीय जनतंत्र

Brajesh kumar Jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Tue Jun 16 04:18:42 CDT 2015


भारतीय जनतंत्र की पड़ताल करती एकांगी बहस


उम्मीद से विपरीत कुछ हो, तब आश्चर्य होता है। साहित्य अकादमी के सभागार में
वही हुआ। भारतीय जनतंत्र का जायजा बहुकोणीय दृष्टि से लिया जाएगा, यह
सोच-समझकर वहां आने वालों की संख्या कम नहीं थी। लेकिन, छह जून को जो हुआ,
उससे वे निराश हुए।


वजह यह थी कि संवाद नितांत एक-पक्षीय था। हालांकि, विकासशील समाज अध्ययन पीठ
(सीएसडीएस) के शोधार्थी हिलाल अहमद जब यह कह रहे थे कि “जायजा किस कोने से
लिया जा रहा है, यह कम महत्व की बात नहीं है।” तब ऐसा लगा कि वे बाड़े से बाहर
निकलकर अपनी बात रखेंगे, लेकिन उम्मीद बेकार गई। दरअसल, ऐसा कह कर वे अपने
वास्ते लकीर ही खींच रहे थे, जिस दायरे में उन्होंने बात रखनी थी।

वैसे तो ‘आलोचना’ पत्रिका के संपादक अपूर्वानंद ने दावा किया था कि संवाद के
दौरान 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों की रोशनी में भारतीय जनतंत्र का अलग-अलग
कोणों से जायजा लेने की कोशिश होगी। पर, सवाल है कि क्या किसी पूर्वाग्रह के
साथ यह संभव है? एक खास दिमागी संरचना में जनतंत्र और उसमें आ रही तब्दीली को
मुकम्मल तरीके से समझा जा सकता है?


ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कार्यक्रम का संचालन कर रहे पत्रकार
रवीश कुमार जब कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी जिस अंदाज में 2014 का लोकसभा चुनाव
लड़ रहे थे, उसमें बगैर पार्टी के वे जीत जाते तो भी आश्चर्य की बात नहीं थी।
बेशक वे गंभीर आरोप लगा रहे थे, जिसका कोई पुख्ता प्रमाण या तर्क नहीं दिया।
यह पूर्वाग्रह नहीं, तो फिर क्या कहा जाएगा?


कार्यक्रम में शिरकत कर रहे कुछेक लोगों की राय थी कि वाद में घिरकर भारतीय
जनतंत्र का जायजा लेने का दावा करना बेईमानी होगी, क्योंकि वहां किसी खास धारा
से अलग कुछ देखने-सुनने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है।


कार्यक्रम के प्रारंभ में ही अपूर्वानंद ने सवाल उठाया था कि ‘आलोचना रहेगी या
नहीं रहेगी? यह महत्वपूर्ण चिंता का विषय बनकर रह गया है।’ यह सुखद संयोग ही
रहा कि पत्रिका के प्रधान संपादक नामवर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की
सख्त आलोचना कर उन अटकलों को खारिज कर दिया कि आलोचना किसी संकट में है। नामवर
सिंह ने कहा, “नरेन्द्र मोदी जब बोलते हैं तो मुझे ऐसा लगता है कि हिटलर बोल
रहा है।” फॉर्मेट और कंटेंट का हवाला देते हुए उन्होंने वर्तमान जनतंत्र की
मुकम्मल समीक्षा की। इस बात को समझने में रवीश रह गए। एक संस्मरण सुनाते हुए
कहा- “बर्लिन में एक शख्स ने कहा कि जब कुछ कहने को नहीं होता है, तब लोग
हिटलर का नाम लेते हैं।”

बहरहाल, संवाद गोष्ठी में सीएसडीएस के राजनीतिशास्त्री आदित्य निगम ने नई बात
कही। उन्होंने कहा कि सियासत सिर्फ राजनीति की औपचारिक जमीन पर नहीं होती, वह
हर जगह होती है। कहीं भी, किसी भी वक्त होती है और फिर बनी-बनाई चीजों को
बिगाड़कर चली जाती है। जबकि, राजनीति औपचारिक राज-काल की नीति है, जिसका
उद्देश्य चीजों को व्यवस्थित करना और झंझावतों को हटाना होता है। निश्चित रूप
से आदित्य निगम हिन्दुस्तान की राजनीति को समझने का अलग तजुर्बा दे रहे थे,
लेकिन बात पूरी नहीं हो पाई। रवीश कुमार का छह मिनट वाला प्राइम टाइम फॉर्मेट
आड़े आया।


जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की राजनीतिशास्त्री अनुपमा रॉय ने कहा कि इस
जनतंत्र में क्या चुनाव ही एक माध्यम है, जहां जन स्वयं को प्रदर्शित कर सकता
है? हालांकि, इन्हें लोग विस्तार से सुनना चाहते थे, लेकिन संवाद गोष्ठी का जो
स्वरूप था, उसमें इसकी गुंजाइन नहीं थी।


यह विचित्र बात है कि भारत का बुद्धिजीवी वर्ग धारा से अगल संवाद के लिए तैयार
नहीं होता है। ऐसे में गंभीर और जरूरी संवाद भी एक-पक्षीय होकर रह जाता है,
जहां दूसरा पक्ष अक्सर हंसी का पात्र होता है। हालांकि, आलोचना पत्रिका की जो
पहचान है, उससे तो उम्मीद रखी जा सकती है कि वह कभी-न-कभी अपनी संवाद गोष्ठी
में इस हद के पार जाएगी। प्राइम टाइम के आगे भी सोचेगी। सुनने वाले लोग होंगे।
वह कोई वादी नहीं होंगे। वहां न कोई राष्ट्रवादी खड़ा होगा। न वामवादी। न
जनवादी।
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