[दीवान]लेखक कोई और, कहलाते लेखक कोई और हैं

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Thu Feb 26 00:17:10 CST 2015


शायद रवीश( Ravish Kumar​) को इस बात की जानकारी भी न हो, उनके साथ-साथ बाकी
लेखकों-ब्लॉगरों को भी इस बात की कोई खबर न हो कि  इनके नाम से अखबार में छपे
लेख, इनकी ब्लॉग पोस्ट को नत्थी करके एक शख्स ने  तीन-चार पेज की आड़ी-तिरछी
भूमिका चिपकायी और सात सौ रुपये की सोशल मीडिया की किताब का लेखक और विशेषज्ञ
बन बैठा. ये काम देशभर में धडल्ले से जारी है लेकिन आपको इस धंधे और किताबों
पर बहुत कम ही नजर जाएगी.
नजर इसलिए नहीं जाएगी क्योंकि ये किताबें आपके-हमारे जैसे पाठकों के लिए छापी
नहीं जाती है, इसे हमारे हाथों बेचना नहीं होता है बल्कि लिटररी लाइब्रेरी में
थोक खरीद पर डम्प करनी होती है. आप देश के किसी भी प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान
के स्टाफरूम में  तीन-चार दिन बैठ जाएं और किताबों के एजेंट से बात करनी शुरु
करें, उनकी लाई किताबें और दवाब बनाकर लाइब्रेरी के लिए रिकमेन्ड करने के खेल
पर गौर करें, आपको लगेगा कि इस पूरी प्रक्रिया में प्रकाशक,लेखक और बिक्री के
बीच पाठक कहीं नहीं है. सिर्फ वो स्टूडेंट्स है जिसे परीक्षा के लिए तत्काल
में कुछ सिलेबस आधारित सामग्री चाहिए..इधर लेखक को इस बात की तड़प होती है कि
उसे किसी भी तरह से चुटका किताब लिखनेवाला न समझा जाए. ऐसे में वो उन लेखकों,
स्तंभकारों की सामग्री टीपकर, ऐवें टाइप की संपादकीय लिखकर किताब छपवाते हैं
जिन नामों से स्टूडेंट परिचित होते हैं. वो हुलसकर किताब इश्यू कराते
हैं.चूंकि किताब की टाइटल बिल्कुल सिलेबस से मेल खाती है तो बहुत देर नहीं
लगाते. कई बच्चों को मैंने खरीदते वक्त मना किया है- ऐसी किताबें मत खरीदो, उस
पैसे से जूस पी लो, देह बनाओ.

अब ऐसी किताबों की ऐसे वक्त में चर्चा कर रहे हैं जबकि लोगों के हाथ में इश्क
में शहर होना एक ऐसी किताब है जिसकी सामग्री छपने से पहले सैकड़ों की नजरों से
गुजर चुकी है..बावजूद इसके लोगों ने पैसे लगाकर खरीदे हैं और तमाम तरह से
उत्साह बढ़ाने के बीच अच्छी खासी संख्या में इसकी असहमति में भी बातें हो रही
है, जिसके कई कारण और आधार हैं. मुझे इस संबंध में कोई तर्क-वितर्क प्रस्तावित
नहीं करना है.

मेरा बस इतना कहना है कि ये किताब चूंकि पब्लिक स्फीयर में सहज उपलब्ध है तो
आप चाहें इसकी तारीफ करें, चाहे वाजिब आलोचना..सब हम सबके सामने है..लेकिन सात
सौ से लेकर हजार-हजार रूपये में बिना बताए छपी हुई,पोस्ट की हुई सामग्री नत्थी
करके, चुटका संपादकीय लिखकर जो किताबें छापकर लाइब्रेरी में डम्प की जा रही है
जिसका कि करोड़ों में राजस्व बनते हैं, उन पर कौन बोलेगा ? क्या ये किताबें
हमारी बहस का हिस्सा भी रही है ? क्या जिन 35-चालीस लेखकों की सामग्री नत्थी
की जाती है, उनसे अनुमति क्या सूचना तक दी जाती है ? उनको किताब की एक प्रति
दी जाती है ? जिन अखबारों-पत्रिकाओं से सामग्री लेकर नीचे साभार भर लिख दिया
जाता है, उतने से काम चल जाता है ?

ये तीन-चार पेज की घासलेटी संपादकीय जिन्हें पढ़कर आपको आसानी से अंदाजा लग
जाएगा कि शख्स ने जिस शीर्षक के तहत छपी सामग्री नत्थी की है, उसकी उन्हें
रत्तीभर भी समझ नहीं है.. उन्होंने इसे सिर्फ अपनी ग्रेड,सैलरी,ओहदे चमकाने के
लिए छपवाया है जिसमे प्रकाशक बराबर से जिम्मेदार है.

आपकी बातचीत से गुजरते हुए मुझे बेहद अच्छा लग रहा है कि आप प्रकाशन,पुस्तक और
पाठ की दुनिया के बीच हो रही गतिविधियों को लेकर बेहद सजग हैं. आप चाहते हैं
कि जो चीजें छापी जा रही हैं, उनका कायदे से मूल्यांकन हो..ऐसे में क्या ये
जरूरी नहीं है कि छपनेवाले प्रोडक्ट का एक बड़ा हिस्सा जो पब्लिक स्फीयर में
ठीक से आ नहीं पाते, लाए ही नहीं जाते..उन्हें भी बहस में शामिल करें.
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