[दीवान]कुछ कैटेगरी कविताएं

Zaigham zaighamimam at gmail.com
Mon Mar 24 15:08:44 CDT 2014


अच्छे से पढ़ना 
जनरल में क्लियर करना :) पठनीय कैटेगरी कविताओं के लिए साधुवाद। 
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On 24-Mar-2014, at 16:31, Shubham Shree <shubhamshree91 at gmail.com> wrote:

> कुछ कैटेगरी कविताएं
> 
> (1)
> 
> आरक्षित/अनारक्षित
> यही वर्ण
> यही जाति
> यही गोत्र
> यही कुल
> हमारे समय की रीत है
> शास्त्र में नहीं
> संविधान में लिखा है ।
> 
> (2)
> 
> डीजे बंद होने तक नाचेंगे
> इरिटेट कर देने की हद तक चिढ़ाएंगे
> कैंटीन का हिसाब रहेगा 50-50
> बातें अनगिनत बहुत सी
> होती रहेंगी
> दिन रात
> साथ साथ
> क्लास, कॉरीडोर, कोर्स, एग्जाम
> लेक्चर में काटा पीटी खेलेंगे
> मैसेज करेंगे
> टीचर का कार्टून बनाएंगे
> हंसेगे अपनी दूधिया हंसी
> लड़ेंगे बिना बात भी
> फिर अलग हो जाएंगे एक दिन
> हम यूनीवर्सिटी के सीलन भरे स्टोरों में
> बक्सों में बंद कैटेगरी हो जाएंगे
> एसटी/एचएच/2/2013 जेन/सीओपी/7/2011
> पीएच/ईई/1/2012 एससी/आइआर/3/2012
> 
> कोटा
> (आइ, टू, एम ऑक्स/ब्रिज के लिए)
> 
> हम आते हैं
> आंखों में अफ्रीका के नीले सागर तट भरे
> एशिया की सुनहरी मिट्टी का रंग लिए
> सिर पे बांधे अरब के रेगिस्तान की हवाएं
> सुरम्य जंगलों से, पूर्वजों के स्थान से
> गांवों के दक्षिणी छोरों से
> अपमानित उपनामों से
> अंधेरी आंखों के साथ
> असमर्थ अंगों के साथ
> यूनीवर्सिटी के नोटिस बोर्ड पर
> ...
> हम केवल नाम नहीं होते
> ...
> सेमेस्टर के बीच कुछ याद नहीं रहता
> क्लास में, लेक्चर में, लाइब्रेरी में
> पढ़ते, लिखते, सोचते
> भूल जाते हैं बहुत कुछ किसी और धुन में
> लेकिन
> हर परिचय सत्र में
> हर परीक्षा के बाद
> हर स्कॉलरशिप से पहले
> हर एडमिशन में
> यूनीवर्सिटी याद दिलाती है
> हमारा कोटा
> जैसे बिना कहे याद दिलाती हैं
> कई नज़रें
> हमारी पहचान
> 
> दलित
> 
> नाम चुक जाएंगे
> हर मोड़ पर 
> हमसे पहले पहुंचेगी
> हमारी पहचान
> सदियों का सफर पार करती हुई
> हम नए नाम की छांव में
> रुकेंगे थोड़ी देर
> चले जाएंगे
> 
> जनरल
> 
> मैं नहीं कर पाऊंगी दोस्त
> काम बहुत हो जाता है
> घर, ट्यूशन, रसोई
> समय नहीं मिलता
> तुम तो हॉस्टल में हो
> अच्छे से पढ़ना
> जनरल में क्लियर करना
> 
> 
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