[दीवान]स्त्री दिवस पर विशेष (पटेल से संलाप : किश्त ८ )

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Sun Mar 9 09:24:16 CDT 2014


महमूद भाई, इस ज़र्रानवाज़ी के लिए बेहद शुक्रगुजार हूँ, और तहेदिल से आपकी
मुबारकबाद कुबूल करता हूँ। लेकिन आपकी प्रतिक्रिया से निकला यह सवाल भी उतना
ही गौरतलब है कि (पुरुष) सत्ता (वादी) समीकरणों के ऐसे न जाने कितने दूसरे
मार्मिक प्रसंग अभी भी अतीत के तहखानों में ही क्यों बंद हैं? वैसे,
सत्ता-विमर्श जैसे सर्वग्रासी फ़लक़ के मद्देनज़र भी यह दावा कि 'आजादी पूर्व
कांग्रेस के इन्हीं सत्ता-समीकरणों ने विभाजन और आजादी के बाद भी एक शासक
पार्टी के रूप में लंबे समय तक कांग्रेस की पहचान का निर्धारण किया' मुझे नहीं
लगता कि कहीं से कुछ गलत साबित होगा। हालांकि, इस दौरान एक मौकापरस्त और
समझौतापरस्त कांग्रेसी निज़ाम के ख़िलाफ़ जुझारू स्वर भी बराबर सुने जा सकते हैं।
और इसी सिलसिले में तब हम यहाँ याद कर सकते हैं अपने उस दूसरे महबूब 'सरदार'
याने शायर अली सरदार जाफ़री को जिन्होंने कुछ यूँ लिखा कि 'तोड़ के रख दो
बारदोली के हर अफ़साने को, आज हर राह जाती है तेलंगाने को !!'


2014-03-09 19:53 GMT+05:30 kamal mishra <kissakhwar at gmail.com>:

> महमूद भाई, इस ज़र्रानवाज़ी के लिए बेहद शुक्रगुजार हूँ और तहेदिल से आपकी
> मुबारकबाद कुबूल करता हूँ! लेकिन आपकी प्रतिक्रिया से निकला यह सवाल भी उतना
> ही गौरतलब है कि (पुरुष) सत्ता (वादी) समीकरणों के ऐसे न जाने कितने दूसरे
> मार्मिक प्रसंग अभी भी अतीत के तहखानों में ही क्यों बंद हैं? वैसे,
> सत्ता-विमर्श जैसे सर्वग्रासी फ़लक़ के मद्देनज़र भी यह दावा कि 'आजादी पूर्व
> कांग्रेस के इन्हीं सत्ता-समीकरणों ने विभाजन और आजादी के बाद भी एक शासक
> पार्टी के रूप में लंबे समय तक कांग्रेस की पहचान का निर्धारण किया' मुझे नहीं
> लगता कि कहीं से कुछ गलत साबित होगा। हालांकि, इस दौरान एक मौकापरस्त और
> समझौतापरस्त कांग्रेसी निज़ाम के ख़िलाफ़ जुझारू स्वर भी बराबर सुने जा सकते हैं।
> और इसी सिलसिले में तब हम यहाँ याद कर सकते हैं अपने उस दूसरे महबूब 'सरदार'
> याने शायर अली सरदार जाफ़री को जिन्होंने कुछ यूँ लिखा कि 'तोड़ के रख दो
> बारदोली के हर अफ़साने को, आज हर राह जाती है तेलंगाने को !!'
>
>
> 2014-03-08 21:39 GMT+05:30 mahmood farooqui <mahmood.farooqui at gmail.com>:
>
>> kya cheez nikaal ke laaye hain mishra ji. Mujhe nahin lagta ki azadi purv
>> congress ke satta sameekron ka is se behtar koi prasang maine aajtak parha
>> hai. Mubarak
>>
>>
>> 2014-03-08 21:05 GMT+05:30 kamal mishra <kissakhwar at gmail.com>:
>>
>>>  दोस्तों, मांत्रिक के शरीर में प्रविष्ट वल्लभ भाई पटेल की आत्मा से
>>> मैंने जब सवाल पूछा कि, सरदार साहब, आख़िर क्यों १९३७ में प्रांतों में सरकार
>>> गठन के बाद बेतरह उठापटक मची, और खास करके मध्य प्रान्त में तो दलित महिला से
>>> बलात्कार के आरोप में सजा काट रहे चार दोषियों को साफ छोड़ने का आदेश नारायण
>>> भास्कर खरे मंत्रिमंडल के ऐसे सदस्य द्वारा जारी किया गया जिसके ऊपर खुद कानून
>>> विभाग का ही दायित्व था? तो यह सवाल सुनकर पटेल साहब कि आत्मा ने बड़ी भारी
>>> आवाज में कहना शुरू किया कि बलात्कार कि वह दुःखद घटना दरअसल १९३६ में वर्धा
>>> के एक सब इंस्पेक्टर दाऊद के घर पर हुयी थी। उस घृणास्पद कृत्य में दाऊद के
>>> अलावा शिक्षा विभाग का एक अधिकारी जफ़र, अमरावती का एक वकील सर्फुद्दीन, और तीन
>>> अन्य लोग भी शामिल थे। बाद में शिनाख्त न हो पाने के चलते सर्फुद्दीन तो बच
>>> गया लेकिन तीनों सहअभियुक्तों को दो-दो साल, जफ़र को तीन और दाऊद को चार साल के
>>> लिए कैद- ए- बामशक्कत जैसी सज़ा सुनायी गयी। वैसे घटना में शामिल सभी अभियुक्त
>>> प्रभावशाली मुसलमान और पीड़िता मोची जाति की एक तेरह वर्षीय बालिका थी। इस बुरी
>>> घटना की खबर ने सारे मध्य प्रान्त में बड़ी सनसनी फैला दी। घटना के बाद से हर
>>> तरफ इसी की चर्चा थी, जब तक कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश ने अप्रैल
>>> १९३७ में इस मामले से सम्बंधित सुनवायी के लिए आयी याचिका को ख़ारिज करते हुए
>>> दोषियों की सजा को बहाल रखने का अपना अंतिम फैसला नहीं सुना दिया।
>>>
>>> पहले पहल मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष में कुल पाँच
>>> वकील शामिल थे। छह दिनों तक लड़की से सवाल-जवाब किया जाता रहा और इस मुकदमें के
>>> दौरान अकेले पीड़िता का बयान ही १११ पन्नों में दर्ज हुआ। बाद में, बचाव पक्ष
>>> ने मुकदमें को एक यूरोपी आई. सी. एस अधिकारी के समक्ष सुनवाई के लिए भेजे जाने
>>> की गुहार लगायी जहाँ सुनवाई के बाद उन अभियुक्तों की सजा पर निर्णय की मोहर
>>> लगा दी गयी। लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विचार के लिए दाखिल याचिका को
>>> अप्रैल १९३७ में अंतिम रुप से ख़ारिज किये जाने तक मामले का मुख्य आरोपी जफ़र
>>> ज़मानत पर खुला घूमता रहा। इस दौरान तीनों अदालतों में से किसी एक में भी यह
>>> तर्क बचाव पक्ष की तरफ से सामने नहीं आया कि लड़की की रजामंदी से उसके साथ
>>> संबंध बनाया गया था, और न ही यह कि ये एक तकनीकी मामला था। फिर बाद में
>>> दोषियों की तरफ से सजा कम करने जैसी कोई याचिका भी कहीं नहीं दी गयी। लेकिन
>>> जनवरी १९३८ में कांग्रेस की प्रांतीय सरकार के मिनिस्टर ऑफ जस्टिस मि. शरीफ़ ने
>>> इस मामले के तीन प्रमुख बंदियों की रिहाई का आदेश जारी करते हुए उनकी सजा घटा
>>> कर सिर्फ एक वर्ष कर दी। इस आशय के अपने आदेश में मि. शरीफ़ ने यह कहा कि यह
>>> महज़ एक तकनीकी अपराध था जिसमें संभोग के लिए लड़की खुद रजामंद थी और इसलिए
>>> अदालत का वह फैसला बेहद कड़ा और अनुचित है।
>>>
>>> इतना ही नहीं तीन प्रमुख दोषियों को जेल से रिहा करने के बाद अभी जेल में
>>> एक साल से भी कम की कैद में रहे जफ़र की दया याचिका को भी मि. शरीफ़ ने यह
>>> निर्णय लिखते हुए स्वीकार कर लिया कि उसकी पत्नी कि मृत्यु के बाद उसके
>>> नाबालिग बच्चों की देख-रेख की सारी जिम्मेवारी अब खुद जफ़र की ही है इसलिए उसे
>>> एक वर्ष न पूरा होने की सूरत में भी रिहाई मिलनी चाहिए। गौरतलब है कि मि. शरीफ़
>>> के अतिरिक्त किसी ने भी, मतलब खुद आरोपियों ने भी, इस मामले में अपराध को
>>> तकनीकी बताने या लड़की की तरफ से किसी किस्म की रजामंदी के होने जैसी बात कहने
>>> का हौसला नहीं दिखाया था। इस निर्णय में यह कहा गया कि लड़की पहले से ही यौनिक
>>> अनुभव संपन्न थी, जबकि इस अनुमान के लिए कोई विशेष सबूत नहीं था। कुल मिला कर
>>> चिकित्स्कीय प्रमाण तो इसके विरोधी दावे को ही पुष्ट करते लगते थे। फरवरी में
>>> जफ़र की रिहाई के बाद सब इंस्पेक्टर दाऊद की प्रार्थना भी विचार के लिए स्वीकार
>>> कर ली गयी। दस अप्रैल के बाद उसकी प्रार्थना के ऊपर निर्णय सुनाने का फैसला भी
>>> आगामी विधान सभा बैठक के बिना हंगामे सकुशल संपन्न हो जाने की गरज से लिया गया
>>> ही प्रतीत होता था। इस बीच मि. शरीफ़ ने इसी मामले से सम्बद्ध रहे सर्फुद्दीन
>>> को, जिसे शिनाख्त न हो पाने के चलते पहले ही बरी कर दिया गया था, अमरावती का
>>> पब्लिक प्रोसिक्यूटर नियुक्त करने का भी प्रयास किया। जिसका दूसरे सभी
>>> मंत्रियों ने जमकर विरोध किया और इसलिए मि. शरीफ़ को अपना यह कदम वापस लेना
>>> पड़ा। बाद में शरीफ़ ने यह स्वीकार किया कि ऐसा वे अपनी बीबी के दबाव में कर रहे
>>> थे जो सर्फुद्दीन की पत्नी की बहन लगती है।
>>>
>>> इस मामले में शरीफ़ के विवादास्पद निर्णयों की प्रतिक्रियां में शहर में
>>> बढ़ते असंतोष और लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर कांग्रेस विधायक दल
>>> के कुछ सदस्यों ने ९ या १० मार्च को एक बैठक बुला कर इस मसले पर शरीफ से बात
>>> करने का फैसला किया। इस बैठक में शरीफ़ उपस्थित रहे। डेपुटी स्पीकर श्रीमती
>>> काले इस बैठक में शरीफ़ महोदय के निर्णयों की निर्मम आलोचना करते हुए रो पड़ी।
>>> जिसके बाद शरीफ़ ने एक पूरी तरह उपेक्षापूर्ण रवैया दर्शाते हुए और अपना पक्ष
>>> स्पष्ट करते हुए यह कहा कि यह कोई वैसा मामला नहीं है कि जिस पर औरतों की
>>> मौजूदगी में खुल कर बात हो सके और मैंने सोच समझ कर ही उन्हें रिहा करने का
>>> फैसला किया है। जब अखिल भारतीय कांग्रेस संसदीय उप समिति के चेयरमैन की हैसियत
>>> से मैं वल्लभ भाई पटेल स्वयं ११ मार्च १९३८ को वर्धा पहुंचा तो इस मामले के
>>> सभी तथ्यों की जाँच के लिए मैंने प्रधान मंत्री (प्रांत का मुख्य मंत्री) खरे
>>> और रविशंकर शुक्ल को तलब किया। उन्होंने बताया कि उन्हें खुद जफ़र की रिहाई का
>>> पता सबसे पहले समाचार पत्रों के माध्यम से चला और इस निर्णय के बारे में वो
>>> पहले से वाकिफ नहीं थे। इस निर्णय को शरीफ ने दो महीने तक गुप्त रखा जिससे खरे
>>> और शुक्ल भी अत्यंत नाराज थे और चाहते थे कि इसके लिए मंत्री का इस्तीफा ले
>>> लिया जाय। मैंने डॉक्टर खरे को साथ ले कर सेगाव में महात्मा गांधी जी से भेंट
>>> की। खरे ने बापू को सारे मसले की जानकारी दी। जिसके बाद मामले की गम्भीरता और
>>> प्रदेश के बाहर भी इसके चलते होने वाले सम्भावित नुकसानों को देखते हुए शरीफ़
>>> से इस्तीफा लेने का विकल्प तय हुआ। यह फैसला हुआ कि इस मामले को कार्यसमिति को
>>> सूचित कर दिया जाय जो इस पर निर्णय करे।
>>>
>>> शरीफ़ ने खुद यह स्वीकार किया कि उन्होंने अपने इन निर्णयों की सूचना
>>> सहयोगियों को भी नहीं दी थी। हालांकि, वो कोई गैर तजुर्बेकार व्यक्ति नहीं थे।
>>> इससे पहले की सरकार में वो लम्बे समय तक शिक्षा मंत्री का दायित्व निभा चुके
>>> थे। वो जफ़र को अपने उसी पिछले कार्यकाल से ही जानते आये थे क्योंकि उस दौरान
>>> सब इंस्पेक्टर जफ़र एक अधीनस्थ के रूप में अमरावती डिविजन के दौरों पर उनके साथ
>>> होता था। एक तरह से जफ़र और सर्फुद्दीन दोनों ही शरीफ़ साहेब के पूर्व परिचितों
>>> में से थे। तब मैंने ऐसे सभी मामलों की, जिनके बारे में यह अफवाह थी कि नैतिक
>>> अपराधों में लिप्त पाये गए बंदियों को शरीफ़ साहेब ने रिहाई के आदेश दिए हैं,
>>> बलात्कार के उक्त मामले के साथ ही, आख्या भेजने और शरीफ़ साहब का पक्ष भी
>>> उपस्थित करने के लिए प्रधान मंत्री खरे को लिख भेजा। रिपोर्ट भेजने के पहले ही
>>> खरे द्वारा विधान सभा सदस्यों की एक बैठक बुलायी गयी जहाँ इस वाकये पर लंबी
>>> बहस हुयी। जिसके बाद मुझे डॉक्टर खरे का इस आशय का पत्र मिला कि शरीफ़ द्वारा
>>> क्षमा याचना करने के बाद मामला समाप्त कर दिया गया है। सच तो ये है कि उस
>>> तूफानी बैठक में जो लगभग आठ घंटे चली एक बार फिर श्रीमती काले ने शरीफ़ साहब की
>>> निर्मम आलोचना की और वे कष्ट से भर कर रो पड़ीं।  जिसके बाद शरीफ़ बैठक छोड़ कर
>>> चले गए। और घर पहुँच कर उन्होंने एक चिट्ठी लिख भेजी जिसमें कहा गया था कि "वो
>>>  एक बहन को अपने सामने रोता हुआ नहीं देख सकते और इसी लिए बैठक छोड़ कर चले गए।
>>> लेकिन अगर उनका इस्तीफा ही उस बहन को संतुष्ट कर सकता है तो वो इस्तीफा देने
>>> को तैयार हैं।" जिसके बाद बैठक के अंत में शरीफ़ के समर्थन में एक घोषणा पास
>>> हुयी जिसकी एक प्रति कार्यसमिति को भी स्वीकृति के लिए भेज दी गयी। इस घोषणा
>>> का आधार यह समझ थी कि शरीफ़ ने जफ़र को रिहा करने के अपने फैसले में हुई निर्णय
>>> की चूक को स्वीकारते हुए इसके लिए माफ़ी चाही है।
>>>
>>> एक तरफ जहाँ कई मंत्रियों का यह कहना था कि न तो वे और न ही पार्टी के अन्य
>>> सदस्य शरीफ द्वारा सिर्फ इस बात के लिए ही माफ़ी माँगने भर से संतुष्ट हो सकते
>>> हैं कि उन्होंने मुजरिमों की रिहाई के आदेश जारी करने से पहले अन्य सहयोगियों
>>> को खबर न कर के गलत किया है, क्योंकि वो अच्छी तरह से जानते थे कि ऐसा
>>> विवादास्पद निर्णय तो वैसे भी पूरे प्रदेश में एक तूफान खड़ा कर देगा। वहीँ
>>> दूसरी तरफ शरीफ़ ने यह साफ कह दिया कि उन्होंने जफ़र को रिहा कर के कुछ गलत नहीं
>>> किया है, क्योंकि उन्हें यह मामला एक तकनीकी अपराध का लगता है। हालाँकि
>>> उन्होंने इस बात के लिए माफ़ी चाही कि उन्होंने इस प्रकृति के मामले में निर्णय
>>> लेते समय अपने सहयोगिओं से पहले ही विचार विमर्श न कर, जैसा उन्होंने विरोध के
>>> बाद किया, गलती की है। बहरहाल, प्रधान मंत्री खरे द्वारा भेजी सूचना से मैं
>>> कतई संतुष्ट नहीं था।  और इस लिए मैंने कांग्रेस कार्यसमिति के सामने यह
>>> प्रस्ताव रखा कि वह कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायधीश मन्मथनाथ
>>> मुखर्जी से शरीफ द्वारा चार लोगों की रिहाई के आदेश की जाँच कराये। कार्यसमिति
>>> ने मेरा यह प्रस्ताव स्वीकार करते हुए इस पूरे मामले की जाँच के लिए मुखर्जी
>>> को नियुक्त किया। अपनी रिपोर्ट में मुखर्जी ने शरीफ़ के द्वारा दिए रिहाई के
>>> आदेश को गलत तथा असंवैधानिक बताया। न्याय के क्षेत्र में भी इसे उन्होंने
>>> 'अप्रत्याशित' कहा। जिसके बाद १९३८ में ही शरीफ़ को अपने पद से हटना पड़ा,
>>> क्योंकि अब उनके पास कोई और विकल्प नहीं था।
>>>
>>> (आगे भी ज़ारी)
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