[दीवान]कुछ कैटेगरी कविताएं

Shubham Shree shubhamshree91 at gmail.com
Mon Mar 24 06:01:28 CDT 2014


*कुछ कैटेगरी कविताएं*

(1)

आरक्षित/अनारक्षित
यही वर्ण
यही जाति
यही गोत्र
यही कुल
हमारे समय की रीत है
शास्त्र में नहीं
संविधान में लिखा है ।

(2)

डीजे बंद होने तक नाचेंगे
इरिटेट कर देने की हद तक चिढ़ाएंगे
कैंटीन का हिसाब रहेगा 50-50
बातें अनगिनत बहुत सी
होती रहेंगी
दिन रात
साथ साथ
क्लास, कॉरीडोर, कोर्स, एग्जाम
लेक्चर में काटा पीटी खेलेंगे
मैसेज करेंगे
टीचर का कार्टून बनाएंगे
हंसेगे अपनी दूधिया हंसी
लड़ेंगे बिना बात भी
फिर अलग हो जाएंगे एक दिन
हम यूनीवर्सिटी के सीलन भरे स्टोरों में
बक्सों में बंद कैटेगरी हो जाएंगे
एसटी/एचएच/2/2013 जेन/सीओपी/7/2011
पीएच/ईई/1/2012 एससी/आइआर/3/2012

*कोटा*

*(आइ, टू, एम ऑक्स/ब्रिज के लिए)*
हम आते हैं
आंखों में अफ्रीका के नीले सागर तट भरे
एशिया की सुनहरी मिट्टी का रंग लिए
सिर पे बांधे अरब के रेगिस्तान की हवाएं
सुरम्य जंगलों से, पूर्वजों के स्थान से
गांवों के दक्षिणी छोरों से
अपमानित उपनामों से
अंधेरी आंखों के साथ
असमर्थ अंगों के साथ
यूनीवर्सिटी के नोटिस बोर्ड पर
...
हम केवल नाम नहीं होते
...
सेमेस्टर के बीच कुछ याद नहीं रहता
क्लास में, लेक्चर में, लाइब्रेरी में
पढ़ते, लिखते, सोचते
भूल जाते हैं बहुत कुछ किसी और धुन में
लेकिन
हर परिचय सत्र में
हर परीक्षा के बाद
हर स्कॉलरशिप से पहले
हर एडमिशन में
यूनीवर्सिटी याद दिलाती है
हमारा कोटा
जैसे बिना कहे याद दिलाती हैं
कई नज़रें
हमारी पहचान

*दलित*

नाम चुक जाएंगे
हर मोड़ पर
हमसे पहले पहुंचेगी
हमारी पहचान
सदियों का सफर पार करती हुई
हम नए नाम की छांव में
रुकेंगे थोड़ी देर
चले जाएंगे

*जनरल*

मैं नहीं कर पाऊंगी दोस्त
काम बहुत हो जाता है
घर, ट्यूशन, रसोई
समय नहीं मिलता
तुम तो हॉस्टल में हो
अच्छे से पढ़ना
जनरल में क्लियर करना
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