[दीवान]सिनेमा

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Wed Mar 19 07:22:13 CDT 2014


*राजनीति का सिनेमा *



राजनीति परतदार होती है। यहां कुछ बातें उजागर होती हैं। कुछ का आभास होता है।
फिल्म ‘गुलाल’ के बारे में भी यह बात फिट बैठती है। जब मार्च, 2009 में यह
फिल्म आई तो उसकी समीक्षा करते हुए यह कहा गया था। तब 15वीं लोकसभा चुनाव की
तैयारी हो रही थी।

अब समय तो ठहरता नहीं। वह पांच साल आगे निकल चुका है। 16वीं लोकसभा चुनाव की
तारीख घोषित हो गई है। ‘गुलाब गैंग’ नाम की एक नई फिल्म पर्दे पर आई है।
हालांकि, कुछ लोग इसे ऊबाउ फिल्म बता रहे हैं। पर, इस बात को कोई सिरे से
खारिज नहीं कर रहा है कि 21वीं शताब्दी में भी महिलाएं डंडों की जोर पर अधिकार
लेने को विवश हैं। बात संसद के अंदर की हो या बाहर की। स्थितियां और मनोभाव
समान हैं। सिनेमा उसे अपने तरीके से रख रहा है।

इसी तरह 14वीं लोकसभा के वास्ते अप्रैल-मई 2004 में जब चुनाव हो रहे थे तो
फिल्म ‘युवा’ आई थी।  इसमें एक युवक ने भ्रष्ट राजनैतिक तंत्र को सुधारने का
सपना देखता था। इसके लिए वह संघर्ष करता है। उसे सफलता भी मिलती है। प्रदेश
में जड़ जमा चुकी वाम राजनीति और उसकी सत्ता को वह झकझोर देता है। इस फिल्म का
निर्देशन मणिरत्नम ने किया था। हालांकि, वे मूलत: दक्षिण के हैं, पर फिल्म ‘
रोजा’ (1992) और ‘बंबई’ (1995) बनाकर उन्होंने हिन्दी सिनेमा में ऊंचा मुकाम
पाया है।

‘युवा’ को उन्होंने पश्चिम बंगाल की पृष्ठभूमि पर बुना था। तब वह वामगढ़ था।
ताज्जुब की बात है, 10 साल होते-होते प्रदेश के साथ-साथ वहां की छात्र राजनीति
में भी वामधारा को गहरी ठेस पहुंची है। फिलहाल कुछ लोग उन्हें हारा हुआ बता
रहे हैं। लेकिन, मणिरत्नम 10 साल पहले ही अपनी फिल्म के माध्यम से इस बात के
संकेत दिए थे।

वहीं अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गुलाल’ ठेठ राजस्थानी रंग लिए हुए थी। यहां महत्व
की बात यह है कि इन फिल्मों के हवाले से जिन चीजों की तरफ फिल्मकार ने संकेत
किए थे, वह आज की राजनीतिक परिस्थिति में अधिक जटिल रूप में सामने है। युवा
क्रोध फिल्म ‘गुलाल’ और ‘युवा’ के मूल में है। आज इन्हीं युवा क्रोध का हवाला
देते हुए एक नई पार्टी का उभार हुआ है। इस क्रोध को ही वह अपनी ताकत मानती है।
सत्ता में बदलाव की बात कर रही है।

फिल्म ‘गुलाल’ में एक नए राज्य की मांग और नाजायज औलाद होने का क्रोध भी देखने
को मिलता है। हालांकि, यह फिल्म पांच साल पहले बनी थी, जबकि इन दिनों पुत्र की
ओर से पहचान की लड़ाई का एक मामला सुर्खियों में रहा है।

बहरहाल, राजनीतिक रूप से सतर्क निगाह रखने वाले फिल्मकार प्रकाश झा ने पांच
साल के अंतराल पर दो फिल्में बनाई थी। दिसंबर, 2005 में फिल्म ‘अपहरण’ प्रदर्शित
हुई थी, जबकि जून 2010 को ‘राजनीति’ पर्दे पर आई थी।  वैसे यह देखने में आया
है कि हॉलीवुड की तुलना में बॉलीवुड राजनीतिक घटनाक्रम पर कोई बेहतरीन फिल्म
बनाने में असफल ही रहा है। भारतीय राजनीति में दलीय मतभेदों व टकराव की
शिनाख्त करने वाली कम फिल्में हैं, जिन्हें याद रखा जा सके। ऐसी फिल्में तो और
भी कम हैं जो परिवार के भीतर राजनीतिक शक्ति हासिल करने के मकसद में जुटे
लोगों की पहचान कराती है।

हम फिल्म ‘राजनीति’ के बाबत यह नहीं कह सकते कि इस फिल्म ने उस कमी को पूरा कर
दिया है। पर, इतना जरूर है कि इस फिल्म ने समझ बढ़ाने के कुछेक सूत्र जरूर दिए
हैं, जिससे नितांत व्यक्तिवादी हो चुकी राजनीति को समझा जा सकता है। फिल्म का
एक संवाद है, “राजनीति में सही गलत नहीं होता है। जो फिट हो जाए, वही सही
है।”यह संवाद देश और समाज की राजनीति के बाबत नहीं है, बल्कि राजनीति में
निजी
महत्वाकांक्षा के संदर्भ में है। बेशक आधे-अधूरे मन से ही सही, पर हिन्दी
सिनेमा ने ऐसे संकेत दिए है कि युवा नेतृत्व उभर रहा है। फिल्म ‘राजनीति’ में
प्रकाश झा ने इसे विभिन्न कोण से पर्दे पर उतारा है। यह जोखिम भरा था, जिसे
प्रकाश झा ने उठाया।

16वीं लोकसभा चुनाव की तैयारी के मद्देनजर यह दिखलाई देता है कि तमाम
क्षेत्रीय पार्टियों के साथ-साथ राष्ट्रीय पार्टियों में युवाओं की भूमिका
एकबारगी महत्वपूर्ण हुई है। राहुल गांधी से लेकर चिराग पासवान तक कई ऐसे नाम
हैं, जिनका फैसला ही अंतिम होता है। यह बात कम लोग जानते हैं कि भाजपा और
लोजपा का गठबंधन चिराग की पहल का परिणाम है। पुत्र मोह में रामविलास पासवान को
यह फैसला लेना पड़ा है।

बहरहाल, भारत की क्षेत्रीय राजनीति पेचीदा है। हालांकि, वर्तमान राजनीतिक
पृष्ठभूमि में उसकी पूछ बढ़ी है। इसे पर्दे पर उतारना सरल नहीं है। पर, प्रकाश
झा ने कोशिश की है। वे बड़े तामझाम के बीच कुछेक वाजिब सवालों को उठाते चलते
हैं। मसलन- उनका एक दलित किरदार कहता है- “जीवन कुमार हमारी जात के भले हों, बीच
के कैसे हो गए।” यकीनन, यह संवाद चुनाव के दौरान ऊपर से थोपे गए उम्मीदवार के
खिलाफ बगावत है। ऐसे कई सवाल गाजियाबाद से लेकर कई दूसरी जगह अपने-अपने तरीके
से लोग उठा रहे हैं। इससे कई जगह राजनीतिक पार्टियों के लिए मुश्किल हालात
पैदा हुए हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा ठिठक गई है।

खैर, हिन्दी सिनेमा ऐसे संकेतों और टुकड़ों में ही बातें अधिक करता है। उसकी
अपनी वजह है। फिल्मकार गुलजार ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है, “अपने
पोलिटिकल पीरियड पर कमेंट करना आसान नहीं होता है। पर, मैंने यह रिस्क उठाया
है। ‘आंधी’ को लेकर मुझे काफी दिक्कतें उठानी पड़ीं। हालांकि, आज राजनीतिक
हस्तक्षेप पहले से कम हुए हैं। पर, आज राजनीतिक गिरोहों द्वारा हस्तक्षेप हो
रहा है।” गुलजार के इस कथन से उन वजहों को समझा जा सकता है। आखिरकार प्रकाश झा
भी तो फिल्म ‘राजनीति’ के माध्यम से अपने पोलिटिकल पीरियड पर कमेंट कर रहे थे। उसे
लेकर विवाद हुआ था।

यह देखने में आया है कि फिल्मकार राजनीतिक घटनाओं को सांकेतिक रूप में बेशक
इस्तेमाल किया करते हैं, पर उसे केंद्र में रखकर कोई फिल्म बनाने से परहेज ही
करते रहे हैं। फिल्म ‘हु-तू-तू’ को याद करें। इस फिल्म में एक राजनेता का बम
धमाके में घायल हो जाना। फिर समय पर अस्पताल न पहुंच पाने की वजह से दम तोड़
देना। फिल्म की यह घटना 1974-75 के दौर में रेल मंत्री रहे ललित नारायण मिश्र
की याद दिलाती है। उनकी हत्या के संबंध में ऐसे कई किस्से हैं। इससे साफ है कि
फिल्मकार राजनीतिक घटना प्रधान फिल्म बनाना तो चाहता है, लेकिन वह
परिस्थितियां अपने अनुकूल नहीं पाता है। यह देखने में आता है कि कोई फिल्मकार
किसी व्यक्ति, जाति, समुदाय या धर्म पर सीधा कटाक्ष नहीं करना चाहता है। वह
संकेतों और इशारों में अपनी बात कहता है।

16वीं लोकसभा के वास्ते जो चुनाव हो रहे हैं, उसके बाबत दो फिल्मों की चर्चा
जरूरी है। एक फिल्म है ‘ए वेडनसडे’। यह फिल्म सितंबर 2008 में प्रदर्शित हुई
थी। इस फिल्म ने आम आदमी के अस्तित्व का मुद्दा उठाया था। इसका आम आदमी सत्ता
को सीधे चुनौती देता है। और लोग भी उसके साथ खड़े हैं। एक फिल्म है
(चक्रव्यूह)। इसमें गीत लिखे जा रहे हैं ‘मांग रहा नया आदमी जीने के अधिकार को’।
फिल्म ‘रंग दे बसंती’ आई थी। इसने शहरी युवाओं के बदलते मानस को सामने लाने की
कोशिश की थी, जो प्रतिक्रियावादी है और संवेदनशील भी है। वह गाता है ‘कुछ कर
गुजरने को खून चला, खून चला।’ इस फिल्म ने रक्षा घोटाले की बात की थी। संप्रग
सरकार में रक्षा घोटाला और उससे जुड़ी बातें सिर चढ़कर बोलती रही हैं। ऐसे में
क्या यह कहा जा सकता है कि महज कल्पना की जमीन पर इस मुद्दे को उठाया गया था?

दरअसल, यह आम चुनाव आंदोलनों की जमीन पर लड़ा जाने वाला है। ‘रंग दे बसंती’, ‘द
वेडनसडे’, ‘युवा’ आदि फिल्मों ने समय-समय पर उस मनोयोग को पैदा किया है, जहां
युवा वर्ग वर्तमान व्यवस्था को खारिज करने को आतुर है।
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