[दीवान] Shubham

Shubham Shree shubhamshree91 at gmail.com
Tue Mar 18 08:24:30 CDT 2014


*कुछ उदास सपने और एक बुझी हुई मुस्कान*

क्या करूं मैं इस लड़की का ? मुखर्जी नगर की बिना खिड़की वाली पीजी में अकेली
बैठी है । गालों पर गुलाल लगा हुआ फोटो टैग कर रही है । मुझे पता है गुलाल
उसने खुद ही लगाया है । आलू पराठे नहीं खाए होंगे उसने, पक्का मैगी खाई होगी ।
बालकनी में चुपचाप खड़ी है अनुपमा । होली है ।
फेसबुक पर सैकड़ों हंसती- खिलखिलाती होली की तस्वीरों में अनपुमा की सेल्फी
देख रही हूं । जिंदगी को ऐसा नहीं होना था । अनुपमा को ऐसा नहीं होना था । जब
वो यूपीएससी लिखेगी तब कॉपी जांचने वाले को कहां पता होगा कि ये अनपुमा ने
लिखा है । उसके ख को प समझ कर नंबर काट लेगा वर्तनी की गलती का । वाक्य में
एकवचन बहुवचन की उलझन होगी, आजमगढ़ हाशिए पर रहेगा, उसके नंबर कम हो जाएंगे ।
उस एक्जामिनर को पता होगा क्या कि एक प्यारी सी लड़की है जिसके कंधे भारी
बैगपैक लेकर भागते हुए झुक गए हैं । कि उसने महीनों सिर्फ एक वक्त खाया है, कि
वो पानी की खाली क्रेट के नीचे गिलास लगाए रो रही थी, कि वो सुबह मुखर्जी नगर
से नेहरू विहार तक दौड़ती हुई जाती है और उसकी आंखों के आगे अक्सर अंधेरा छा
जाता है । जब वो वापस आती है तो बिना खिड़की के उस कमरे में जिसकी दीवारों पर
मकान मालिक ने टाइल्स लगवा दिए हैं ताकि हर साल पुताई न करानी पड़े । जनवरी
में माइग्रेन से छटपटाती उस लड़की को देखने वाला कौन था, वही टाइल्स, वही
दीवारें, छत । अब तो जींस का आखिरी साइज भी ढीला हो गया है । एक्सट्रा स्मॉल
टीशर्ट भी झूलने लगी है । अनुपमा मुंह अंधेरे बैग लेकर भाग रही है, बिना खाए ।
शायद आखिरी सवाल छोड़ दिए हों उसने, लिख नहीं पाई होगी । धीरे लिखती है, थक
जाती है । बच्ची है । एग्जामिनर को कहां पता होगा ये मेरी अनुपमा की कॉपी है ।

शुरु से ही ऐसी है । खाती नहीं है, खाया नहीं जाता उससे । दो क्लास के बाद ही
थक जाती थी । सुबह कभी उठा नहीं गया उससे और जल्दी नींद आती नहीं । आएगी भी
कैसे । क्लास से आकर सोने की जो आदत है । एनीमिक है पर कौन समझाए । मुंह छोटा
सा निकल आया है पर मुस्कान इत्ती बड़ी, ओह । अब तो मुस्कान भी फीकी पड़ गई है
। एकाएक ट्यूबलाइट की तरह भक से जल नहीं उठती, लैंप की मद्धिम लौ की तरह चेहरे
पर आती है । थोड़ी देर बाद जब चेहरा नॉर्मल होता है तब पता लगता है कि उसके
पहले उसने मुस्कुराया है । मुखर्जी नगर की भीड़ भरी सड़कों पर कोचिंग सेंटरों
की होर्डिंग लगी है । उनके बेसमेंट के रोशनदानों पर जमी धूल में मैं अपनी
अनपुमा की मुस्कान ढूंढती हूं लेकिन मुझे हजार हजार के बैच में घुट रहे सपने
और डिप्रेशन से बोझिल आंखें मिलती हैं । बैच निकलते हैं पर कॉलेज के कॉरीडोर्स
की तरह नहीं । एक असीम उदासी में रंगे चेहरे एक के बाद एक बत्रा के सामने जमा
हो जाते हैं । बहुत देर इंतजार के बाद भी बस नहीं आती । पीली शर्ट वाला लड़का
मशीन का ठंडा पानी के पास तीन बार दाम पूछ चुका है । एक छोटी गोल्डफ्लेक या
ठंडा पानी या ग्रामीण सेवा ? बस स्टॉप की फर्श पर ही सो जाने का मन हो रहा है
उसका । ग्रामीण सेवा ही ले ली उसने । सिगरेट आइएएस बनने के बाद भी पी जा सकती
है और पानी भी ।

अनुपमा ग्रामीण सेवा पर चढ़ती है । एक लड़का जो शायद उसके इंतजार में था, वो
भी चढ़ता है । अनुपमा उतर कर चली जाती है । वो देखता रह जाता है । रात अनुपमा
के मोबाइल पर मैसेज आता है, मीनिंग ऑफ ट्रू फ्रेंडशिप । अनुपमा देखते ही डिलीट
कर देती है ऐसे मैसेज । वो देर तक एक हल्की सी उम्मीद के साथ जवाब का इंतजार
करता है । कुछ नहीं तो गुड नाइट ही कम से कम । अनुपमा सुबह का अखबार जल्दी
जल्दी खत्म कर रही है । जवाब नहीं आता । रात गहराती जाती है । कमरे में अधेड़
हो रहे लड़कों के खर्राटे गूंज रहे हैं । सन्नाटे में नालियों और सीवर की गंध
और तेज हो गई है । दिल्ली के आसमान पर वही कड़वी गंध फैली है, दम घोंटने वाली
। वो मुंह खोल कर सांस लेने की कोशिश कर रहा है लेकिन बार बार उसके माथे के
बीचोबीच हथौड़े की चोट बढ़ती जा रही है । इस बार भी प्री नहीं तो क्या ?

अनुपमा परीक्षा देती है, रिजल्ट देखती है, वापस आ जाती है । फैकल्टी ऑफ ऑर्ट्स
के गलियारों में पैर छू सकती, झोले उठा सकती, रोज चेंबर के दरवाजों पर दस्तक
दे सकती तो शायद उसका नाम भी नोटिस बोर्ड पर होता । नहीं है । किसने कहा कि
कामयाब होने के लिए मेहनत करना जरूरी है ? मेहनत करना जरूरी नहीं होता । तब
मुझे लगता है कि अनुपमा को यूपीएससी ही करना चाहिए । कम से कम मेहनत कर के
कामयाब होने की थोड़ी सी ही सही मगर गारंटी तो है । वो यूपीएससी देगी,
आइबीपीएस देगी, एसएससी देगी । पटेल चेस्ट और मुखर्जी नगर के फासले में जिंदगी
कितनी बदल जाती है । कैफियात एक्सप्रेस रोज आती है । कभी उसने अनुपमा को भी
पहुंचाया था । कैफियात को कभी मुखर्जी नगर आना चाहिए । अनुपमा के पीजी में ।
वो कहे कि मैं तुम्हें लेने आई हूं, घर चलो बेटा । कितनी खुश होगी अनुपमा ।
अरसा हो गया घर गए । अच्छा नहीं लगता । मन नहीं करता । घर पर सिर्फ नजरें होती
हैं और उनमें कई सवाल होते हैं । तब उस बिना खिड़की वाले कमरे में वापस लौट
आने के लिए मन बेचैन होने लगता है ।

अनुपमा ऐसी हो जाएगी, ये तो कभी नहीं सोचा था । अनुपमा को प्यार में पड़ना था,
चहकते हुए फोन करना था, खिलखिलाना था । अनुपमा जिसे प्यार करेगी उससे मिलूंगी
तो क्या कहूंगी मैं । शायद ये कि तुम अपने पहले बच्चे को जितना प्यार करोगे,
अपनी छोटी बेटी को, उसी तरह अनुपमा को प्यार करना । उसके रुखे हाथों पर जो
निशान है, आंखों के नीचे जो घेरे हैं उनकी इज्ज़त करना । तुम गुस्सा होओगे तो
शायद वो खिलखिला कर हंस पड़े लेकिन जो लड़की गले में हाथ डाल कर गाल चूम लेती
है और सॉरी शिनचैन बोलती है उसे अपनी प्रेमिका या पार्टनर मत समझना दोस्त ।
अनुपमा को बहुत बहुत प्यार करना क्योंकि वो भी तुम्हें बहुत बहुत प्यार करेगी
। उसे रुलाना मत । उन्हें बहुत कोसा है मैंने जिनके लिए अनुपमा चहकती हुई
बोलती थी- यार मुझे ना, वो बहुत अच्छा लगता है पर उसकी ना, कोई गर्लफ्रेंड है
। तब बहुत अफसोस किया है । ओ.. कोई बात नहीं डियर । तुम्हें इससे कहीं अच्छा
लड़का मिलेगा, ये तो शकल से ही उल्लू लग रहा है । और हम हंस पड़ते थे ।

अनुपमा यहां नहीं है और लगता है जैसे मेरा कुछ छूट रहा है । बार बार उन्हीं
गलियों, उन्हीं रास्तों की ओर ध्यान जाता है जिनसे होकर वो गुजर रही होगी, थके
हुए पैरों को घसीट रही होगी । इस शहर में वही एक कमरा है जिस पर कभी भी दस्तक
दी जा सकती है, जहां जी भर कर रोया जा सकता है । अनुपमा अपने साथ वो कमरा लिए
घूम रही है । फैकल्टी के गलियारों में, हॉस्टल में, मेट्रो में । मुखर्जी नगर,
गांधी विहार, नेहरू विहार, कैंप.. जहां भी, जिस भी कमरे में वो रहेगी, मेरे
लिए घर रहेगा । काश अनुपमा को फ्लैप पढ़ कर रेफरेंस देना आता, विकीपीडिया से
कॉपी पेस्ट कर के जेस्टोर की लिंक डालना आता । वो सेमिनारों में किसी लेटेस्ट
ट्रेंड के चिंतक के नाम लेकर सवाल पूछ सकती । वो इतनी भोली क्यों है ? उसे ये
क्यों पूछना होता है कि नेट के लिए कौन सी गाइड पढ़ूं इस बार । पुनीत राय कैसी
किताब है ? उसे क्यों नहीं मालूम कि इलाहाबाद या कानपुर से नेट होता है, कि
हमेशा दिल्ली में सेंटर देना जरूरी नहीं । वो लड़के जो फेलोशिप की शराब पी रहे
हैं, जाइंट क्रश कर रहे हैं उन्होंने इलाहाबाद से परीक्षा दी है । उन्होंने
पैर छुए हैं, चाय लाई है । उन्होंने अपने दूसरे नाम का इस्तेमाल किया है ।
उन्हें नहीं पता कि जब वे शराब पीकर पोर्न देख रहे थे तब अनुपमा दो दो घंटे का
अलार्म सेट कर के पढ़ रही थी । उन्हें देख कर मुझे गुस्सा आता है । अनुपमा
उनसे ज्यादा डिजर्व करती है । उसने पार्टी का झंडा नहीं ढोया, उसने कहीं
सेटिंग नहीं की । उसे बस ढेर सारी स्माइली के साथ लव यू लिख कर मैसेज करना आता
है । अनुपमा जो सिर्फ रात भर जग कर पढ़ सकती है, उसके लिए इन यूनीवर्सिटियों
में एक भी सीट नहीं है ? कैसे कहूं कि और पढ़ो, और मेहनत करो । कहा जाएगा क्या
? नहीं कहा जाता ।

साल दर साल अनुपमा का कमरा छोटा होता जाएगा, बालकनी नहीं होगी, जींस ढीली होती
जाएगी । क्या उसकी मुस्कान फीकी होते होते गायब हो जाएगी जैसी थीसिस लिख रही
मेरी नेबर की है ? अनुपमा की खोई हुई मुस्कान को कहां ढूंढूं । यूनीवर्सिटी की
सीढ़ियों पर या मुखर्जी नगर की सड़कों पर ? मैं धौलपुर हाउस को हसरत भरी
निगाहों से देखती हूं । नहीं, अनुपमा के लिए हर शहर में फ्लैट या हर साल गाड़ी
नहीं चाहिए । बस वो ब्रेकफास्ट ठीक से करे और लंच स्किप करने का न सोचे । डिनर
के बाद पानी की बोतल को सुबह तक चलाने के हिसाब में न उलझे । अनुपमा हंसे,
जैसे कालेज के पहले साल में हंसती थी । अनुपमा प्यार करे, जिसे वो करना चाहे ।
दौड़ कर गले लगे और किस करे जैसे वो हमेशा करती थी । इसके लिए मैं क्या करूं ?
क्या करुं कि ऐसा हो ? अनुपमा की सेल्फी ने आज बहुत उदास कर दिया है । मैं उसे
गले लगाकर रोना चाहती हूं । तुम ऐसे मत रहो अनुपमा, मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं
लगता । आइ लव यू <3
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