[दीवान]अमरकांत

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Mon Mar 10 15:14:43 CDT 2014


विश्वनाथ त्रिपाठी के आलेख


साहित्य और समाज से कटे हुए हैं राजनेता


हमारे हिन्दी प्रदेश के जो राजनेता हैं, वे अपने साहित्य व समाज से कटे हुए
हैं। यदि वे अमरकांत जैसे साहित्यकारों को पढ़ें तो उन्हें भारतीय हिन्दी समाज
के मनोभावों को समझने में बहुत मदद मिलेगी।


अमरकांत समकालीन दौर के महान कथाकार थे। उनको प्रेमचंद की परंपरा का कथाकार
कहा और समझा जाता है। इसी परंपरा को कुछ लोग प्रगतिशील परंपरा भी कहते हैं।
लेकिन, परंपरा का कथाकार होने का मतलब यह नहीं है कि अमरकांत ने प्रेमचंद की
नकल की या उनके अनुवर्ती कथाकार हैं। ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि ऐसा कर
किसी परंपरा का विकास नहीं किया जा सकता है। परंपरा का विकास तो कुछ नया कर के
ही संभव है। हम पाते हैं कि अमरकांत के साहित्य में प्रेमचंद से भिन्न प्रकार
के पात्र हैं। उन्होंने अपने कथा साहित्य में जिन स्थितियों की योजना की है,
जो शिल्प विकसित किया है, वह प्रेमचंद से भिन्न हैं। इसी में उनकी महत्ता है।
प्रेमचंद के साहित्य में या उनकी परंपरा के साहित्यकारों में यदि कोई पात्र
गरीब है, तो वह शोषित भी है। अमीर है तो शोषक है या फिर बेहद शरीफ है।


लेकिन, अमरकांत ने एक अलग तरह के गरीब पात्र को गढ़ा है। रचा है। वैसे भी यह
आज की सच्चाई है कि गरीब आदमी यदि शरीफ और बेहद ईमानदार बना रहे तो उनकी
जिन्दगी भी नहीं चल पाएगी। इसलिए वह तबतक ईमानदार है, जबतक की उसे कोई अवसर
नहीं मिलता है। दूसरी तरफ एक जो खास किस्म की शराफत और सज्जनता है।
स्पष्टवादिता है, वह भद्र समाज की ओर से विकसित की हुई है। दरअसल, वह उनकी
विलासिता है, जहां ‘पहले-आप, पहले-आप’ वाली लखनवी संस्कृति दिखाई देती है।


*अमरकांत ने शरीफ, ईमानदार, और शोषित गरीब पात्र की जगह ऐसे पात्र पैदा किए जो
बड़े चालाक हैं। काइया हैं, लेकिन इनका काइयापन और चालाकी बड़ी निरीह है। यह
ऐसी चालाकी है, जिसकी उन्हें जरूरत है। इसमें वे और भोले दिखते हैं। इसलिए ऐसे
पात्रों को ‘निरीह काइया’** कहते हैं। ऐसे काइया जो निरीह हैं।* हम पाते हैं
कि अमरकांत के यहां ऐसे गरीब पात्र हैं, जिसके लिए पूरा सामाज एक कारागार है।
इस कारागार से मुक्त होने की वह पूरी कोशिश करता है। लेकिन, मुक्त नहीं हो
पाता है। आखिरकार पस्त होकर वहीं गिर पड़ता है, किन्तु जहां उसे मौका मिलता
है, वहां वह अपना रंग-ढंग दिखाने से नहीं चूकता है। ‘जिंदगी और जोंक’ का रजुआ
एक उदाहरण है। रजुआ का सभी तिरस्कार करते हैं। वह सभी से पिटता है, लेकिन अवसर
मिलने पर महिलाओं से मजाकर करने से नहीं चूकता है। पगली से प्रेम भाव का संबंध
भी बनाता है। ऐसे कई पात्र अमरकांत ने गढ़े, जो गरीबी में भी अच्छे पल गुजारने
के संयोग तलाश लेते हैं। हालांकि, ऐसे समय में वे बड़े हास्यास्पद और निरीह
दिखलाई देते हैं। इस तरह अमरकांत ने साहित्य में नए ढंग के चरित्र पैदा किए।


उन्होंने अलग-अलग स्थितियों में ऐसे-ऐसे शब्द संयोग निर्मित किए हैं, ऐसी
क्रियाएं निर्मित की हैं और ऐसे अनुभाव का प्रयोग किया है कि वह हिन्दी में
अद्भुत है। उनकी एक कहानी है ‘डिप्टी कलेक्टरी’। इस कहानी में डिप्टी कलेक्टर
के उम्मीदवार के पिता (शकलदीप बाबू) का जो द्वंद्व अमरकांत ने चित्रित किया
है, वह अपने आप में अनूठा है। कहानी के आखिर में जब पिता को मालूम होता कि
उनका बेटा डिप्टी कलेक्टर के लिए नहीं चुका गया है तो वे बेटे के कमरे में
जाकर उसे सोते देखते हैं। करीब जाने के बाद जब उन्हें पता चलता होता है कि वह
जीवित है तो वे संतोष की लंबी सांस लेते हैं और फिर मुस्कराते हैं। दरअसल,
निराशा को व्यक्त करने वाली ऐसी मुस्कराहट हिन्दी में इससे पहले नहीं थी। यहां
बिल्कुल नए प्रकार का अनुभाव मिलता है। इसी तरह उनकी एक कहानी है ‘हत्यारे’।
नवयुवकों के मनोभाव को समझने के लिए यह कहानी काफी महत्वपूर्ण है। अपनी इस
कहानी में *‘सुंदरता की भयावहता’** को उन्होंने जिस तरह चित्रित किया है, वह
मौलिक है।* ऐसे अमरकांत अब हमारे बीच नहीं रहे।


*सभी के विषय में तो नहीं कहा जा सकता, फिर भी हमारे हिन्दी प्रदेश के जो
राजनेता हैं, वे इतने जाहिल हैं और अपने साहित्य व समाज से कटे हुए हैं कि
बताया नहीं जा सकता है। यदि वे अमरकांत जैसे साहित्यकारों को ही पढ़ लें तो
उन्हें भारतीय समाज के मनोभावों को समझने में बहुत मदद मिलेगी। वे इस समाज को
अपेक्षाकृत अधिक जानने और समझने लगेंगे। इन दिनों समाज की स्थितियों को
जानने-समझने के लिए जो सर्वे आदि किए जाते हैं, उससे काफी बेहतर है कि अमरकांत
जैसे सहित्यकार को पढ़ा-समझा जाए। *
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: <http://mail.sarai.net/pipermail/deewan_mail.sarai.net/attachments/20140311/204f9abd/attachment-0001.html>


More information about the Deewan mailing list