[दीवान]हम कभी अपने उपर ही मजे लेते थे

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Thu Sep 26 11:48:10 CDT 2013


आउटलुक न्यूजरुम पर बना ये कार्टून अपने आप में कितना कुछ समेटे हुए है.
संपादक विनोद मेहता के हाथ में चाबुक है, बाकी लोग भी अपनी-अपनी जगह पर
अस्त-व्यस्त और उलझे हैं..लेकिन इसे कभी छापा भी तो अपनी ही पत्रिका आउटलुक
में. मतलब ये कि इतना स्पेस तब भी बरकरार रहा कि ह्यूमर बची रहे. आप इस ह्यूमर
में एक किस्म का खुलापन भी देख सकते हैं.

मुझे याद है न्यूज 24 ने एक बार अपने और चैनल के बाकी मीडियाकर्मियों पर भी
होली के मौके पर ऐसे ही कार्टूननुमा पैकेज बनायी थी जिसे कि लोगों ने बुरा
मानने के बजाय इस खुशी से स्वीकार किया था कि चलो हम इस लायक है कि हमें इस
कार्टून पैकेज में शामिल किया गया. उनलोगों का मन थोड़ा छोटा भी हो गया
जिन्हें कि शामिल नहीं किया गया था.

आपने ( Namrata Joshi<https://www.facebook.com/namrata.joshi?directed_target_id=0>)
) नास्टैल्जिया में अपने पुराने दिनों को याद करते हुए ये कार्टून साझा किया
तो लगा कि मीडिया के भीतर कितनी क्रिएटिविटी, ह्यूमर और अपनी ही आलोचना और
अपने ही उपर मजे लेने की रिवायत रही है..इसे धंधा बनाने के फेर में इसके भीतर
से ये कितना तेजी से खत्म हो रहा है, ऑफिस कितनी ड्राय स्पेस होती जा रही है
कि हम बस पैकेज और स्टोरी फाइल करने भर के लिए रह जाते हैं, अपने ही उपर बने
ऐसे कार्टून देखकर थोड़े वक्त के लिए नास्टॉल्जिक होने लायक नहीं रह जाते..
Outlook anniversary round the corner. Time for nostalgia. Here's our
newsroom circa 2005. Yes am there too...
[image: Photo: Outlook anniversary round the corner. Time for nostalgia.
Here's our newsroom circa 2005. Yes am there too...]
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