[दीवान]क्या सरोकार से लदकर ही आगे बढ़ सकता है सिनेमा ?

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Sep 24 22:52:35 CDT 2013


बायें से विनीत कुमार, अनुभव सिन्‍हा, आनंद एल राय, उदय प्रकाश, रघुवेंद्र
सिंह और अजय ब्रह्मात्‍मज

सिनेमा आपको बिल्कुल एक दूसरी दुनिया में ले जा रहा होता है, तभी बीच में
पट्टी चलानी पड़ जाती है – धूम्रपान से कर्क रोग होता है, सिगरेट का सेवन
स्वास्थ्य के लिए जानलेवा है… और सिनेमा का तिलस्‍म एक झटके में टूट जाता है।
क्या जरूरत है बीच में ऐसी सूचना या विज्ञापन की? एक तरफ तो आपके टेलीविजन पर
फ्लेवर्ड कंडोम के धुंआधार विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं और आप सिनेमा में चाह
रहे हो कि ऐसे विज्ञापन आते रहें… असल में इससे सिनेमा की रिद्म भंग होती है,
वो सब टूट जाता है जिसमें फिल्ममेकर दर्शकों को बांधना चाहता है।

सिने बहसतलब के दूसरे दिन के पहले सत्र वर्तमान का सिनेमाः कंटेंट और कलेक्शन
का द्वंद्व पर बोलते हुए अनुभव सिन्हा ने जब सिनेमा के बीचोंबीच जनहित में
जारी विज्ञापन के नाम पर सिगरेट, तंबाकू आदि के प्रति चेतावनी को शामिल करने
को गैरजरूरी बताया, तो सभागार का माहौल उनकी असहमति में बनने शुरू हो गये।
पीछे और बीच की कुर्सी पर बैठे दर्शक ने अभी कसमसाना शुरू ही किया था कि
फ्लेवर्ड कंडोम के मुद्दे ने ऐसा जोर पकड़ा कि पूरी बहस इस दिशा में उतरती जान
पड़ी कि क्या टेलीविजन में फ्लेवर्ड कंडोम के विज्ञापन जायज हैं? 2013 में
स्मार्ट और एंड्रॉयड फोनधारी लोगों के बीच अभी भी कंडोम ऐसा शब्द है, जिसके
इस्तेमाल से पूरी फिजा में सुरसुराहट फैल सकती है, ये हम सबने खूब विस्तार से
देखा। बहरहाल, पीयूष मिश्रा की भरसक कोशिश से पूरी बहस कंडोम से छूटकर
धूम्रपान तक आयी, लेकिन इस पूरे लबड़ धो-धो में जो एक नये विचार पक्ष का
अभ्युदय हुआ वो ये कि बच्चों पर ऐसे विज्ञापन और सामग्री से क्या असर पड़ता है?

सिनेमा विमर्श को लेकर ये कोई पहली घटना नहीं थी कि कंटेंट और कलेक्शन यानी
सिनेमा के अर्थशास्त्र की बातचीत उन सनातन समस्या की ओर उन्मुख हो गयी, जहां
अगर विषय सिनेमा और भारतीय संस्कृति, उपभोक्तावादी समाज और सिनेमा, बाल ऑब्लिक
किशोरमन बनाम हिंदी सिनेमा रखे जाते तो आधिकारिक रूप से ये सवाल सामने आते।
इसे हिंदी पब्लिक स्फीयर की खूबसूरती या प्रतिबद्धता कहिए या फिर वर्तनी की
बुनावट कि हम हर डेढ़ कोस पर नैतिकता की टंकी भरकर ही आगे बढ़ना चाहते हैं।

अनुभव सिन्हा ने सिनेमा के बीच में धूम्रपान और टेलीविजन पर फ्लेवर्ड कंडोम के
विज्ञापन दिखाये जाने को लेकर जो बात कही (हालांकि टीवी पर जब मैंने पहली बार
चिकेन फ्लेवर्ड कंडोम के विज्ञापन देखे, तो सोचा केएफसी या यो चाइना जैसे
रेस्तरां ने ही ऐसी कोई चीज जारी की है, जैसे अभी रेडियो मिर्ची यौन हिंसा से
बचने के लिए मिर्ची स्प्रे का जमकर प्रोमोशन कर रहा है), उससे पर्याप्त असहमति
हो सकती है और जिनको वैचारिकी का विस्तार करना है, उन्हें असहमति रखनी भी
चाहिए। लेकिन इस घों-घों के बीच जो दो जरूरी सवाल रह गये, उस पर भी बात की
जानी चाहिए थी।

पहली बात तो ये कि गौर करें तो अनुभव सिन्हा ऐसे विज्ञापनों को जनहित सामग्री
मानने के बजाय सिनेमा के बीच में एक शोर के रूप में देख रहे थे। एक तरह से
कहें तो जो हम साहित्य में उपयोगिता और सौंदर्यबोध के विश्लेषण में अक्सर कला
को परिभाषित करते आये हैं, कुछ-कुछ उसी तरह से। मतलब एक फिल्ममेकर बड़े जतन से
फ्रेम दर फ्रेम एक ऐसी दुनिया रचता है, जिससे कि दर्शक सीट पर बैठकर भी दिमागी
रूप से कहीं और चला जाए (present body, absent mind), लेकिन इसी बीच ये
विज्ञापन उस पूरे परिवेश को खत्म कर देते हैं और दर्शक तत्काल उसी चिल्ल-पों
में शामिल हो जाता है, जिससे फिल्ममेकर उसे थोड़े वक्त के लिए दूर ले जाना
चाहता है। छोड़ दीजिए ऐसा किये जाने की अनिवार्यता को, लेकिन अनुभव सिन्हा के
उस आगे के सवाल पर गौर कीजिए – क्या मनोरंजन करना भर सिनेमा का अपने आप में
कोई मूल्य नहीं है? एक तरह से क्या कदम-कदम पर सरोकार से लदे-फदे होकर ही
सिनेमा आगे बढ़ेगा?

सिनेमा के लिए एक ऐसे आकॉस्टिक परिवेश रचने की बात पर असहमत हो सकते हैं,
खासकर तब जब उसी फ्रेम में कहानी से डिस्ट्रेक्ट करके तीन-चार-पांच स्पान्सर्ड
ब्रांड प्रोडक्ट आपकी आंखों के आगे उस दौरान कहानी के चरित्र की शक्ल में
भकभकाते नजर आते हैं… क्या उससे वो रिद्म नहीं टूटता। ये हर उत्पाद कहानी के
बीच आकर एक स्टेटमेंट देकर चले जाते हैं तब फिल्म की लय नहीं टूटती… लेकिन
थोड़ा ठहर कर सोचें तो अगर सिनेमा के सभी रूपों पर टिकने के बजाय कुछ खास
Genre के संदर्भ में रखकर देखें, तब भी अनुभव सिन्हा की बात उतनी ही अपच पैदा
करनेवाली होगी? क्या सिनेमा के साथ मेंटल स्टेटस का कोई संबंध नहीं होता? आप
जिस फिल्म में तकनीक, स्वास्थ्य, मानवीय संबंधों की उन तमाम बारीकियों को
देख-दिखा रहे हैं, उदाहरण के तौर पर आनंद गांधी की “द शिप ऑफ थीसियस” ही ले
लें, तो क्या जो बैठी दर्शक फिल्म देख रही है, उसे अलग से तंबाकू सेवन करने से
कर्क रोग होता है, की जरूरत रह जाती है? ऐसे में जनहित में जारी विज्ञापनों को
शादी-ब्याह-जनेऊ-मुंडन के किसी भी कर्मकांड और विधि-विधानों को ढोते रहने का
क्या मतलब है? अनुभव सिन्हा का जोर एक सिनेमा के बीच जनहित में जारी विज्ञापन
के शोर (noise) जैसा प्रभाव पैदा करने और बाधा बनने के रूप में रेखांकित करने
से था, जिस पर अंतःमहाविद्यालय की तरह पक्ष-विपक्ष में फौरी राय कायम करने के
बजाय आगे गंभीरता से सोचने की जरूरत है और इस पर सख्ती से सवाल उठाये जाने की
जरूरत है कि ठीक है, अगर ऐसे विज्ञापन नहीं आते हैं तो बीच फ्रेम में प्रायोजक
के लोगो चरित्र की तरह चमकेंगे?


श्रोताओं के बीच बैठे आनंद एल राय, पीयूष मिश्रा और अनुभव सिन्‍हा

दूसरी बात जो बच्चों पर पड़नेवाले असर पर जाकर अटक गयी, उसे एक अलग संदर्भ में
भी ले जाकर देखने की जरूरत है। पहली बात तो ये कि हम जिस दौर में जी रहे हैं,
वहां बच्चा एज ए इंडिविजुअल क्या सिर्फ बायलॉजिकली डिफायन किया जाना चाहिए। जो
लोग जूनियर इंडियन आयडल, सारेगमप लिटिल चैम्प्स या छोटे मियां, हंसी के
हंसगुल्ले टाइप के टीवी शो से एक बार भी गुजरे हों, उन्हें समझने में क्या
मुश्किल होगी कि बच्चों की ये दुनिया वयस्क की दुनिया की रिप्लिका बन चुकी है…
और ये सिर्फ टेलीविजन पर नहीं है, असल दुनिया में भी है। इसकी संख्या और तादाद
पर बात होनी बाकी है। आपको मेरी बात पर खुन्नस होगी लेकिन मैं अक्सर ऐसे
बच्चों की जमात से गुजरता हूं, जो हिंदी सिनेमा की किस्सिंग या बेड सीन देखकर
मेरे ही सामने ठहाके लगाते हुए कहते हैं – इट्स शो फनी न। मुझे नहीं पता कि वो
इन दृश्यों का कितना अर्थ समझते हैं लेकिन ये वही बच्चे हैं, जिनकी 3 जी की आठ
सौ हजार एमबी पैक दो दिन में खत्म हो जाती है। वो मुलम्बा पोर्न वेबसाइट या
पोर्नट्यूब की भेंट चढ़ती है, इस पर किसकी कितनी निगरानी है या फिर एक रुपये
की तर्ज पर ध्यात्म में ही डूबते होंगे।

ये जरूर है कि पब्लिकली जब भी हम टेलीविजन और सिनेमा को लेकर बच्चों के संदर्भ
में बात करते हैं, अचानक से इतने आदर्शवादी हो जाते हैं कि जैसे नौ जानते हों
और छह जानते ही नहीं हों। देश की बड़ी आबादी के घर जो अपनी झंझटों से बचने के
लिए बच्चों को कार्टून नेटवर्क की गोद में पटक आते हैं, क्या वो उस वक्त गौर
करते हैं कि डेढ़ सौ रुपये के डियो से आधी दर्जन लड़कियां खिंची चली आती हैं,
इस बेहूदेपन का उन पर क्या असर होता है? आपको तो लग रहा होता है कि बच्चा
नेशनल ज्योग्राफी देखकर नॉलेज बम बनने जा रहा है लेकिन उस पूरे पैकेज में जो
मेंटली एडल्ट हो रहा है, उस पर कितनी बातचीत होती है? ये कमोबेश परवरिश के बीच
जन्म ले रहा भगोड़ापन है, जिसे कि हम अक्सर सिनेमा की बहसों में लाकर टिका
देते हैं?

ऐसे में अगर अनुभव सिन्हा ये तर्क देते हैं कि सिनेमा से कई गुना अश्लीलता
टीवी के जरिये आ रही है, उसके विज्ञापनों के जरिये आ रही है तो कम से कम
सिनेमा में इस स्पेस को तो बने रहने दो, जहां फिल्ममेकर अपने मुताबिक प्रभाव
पैदा कर सके। हालांकि अनुभव सिन्हा का ये तर्क उस यूटोपिया की तरह हैं, जिसे
हम सब अपने-अपने पेशे में देखने की कामना से ग्रस्त होते हैं। फिल्म के
अर्थशास्त्र, मीडिया, इवेंट, ब्रांड और सिनेमा के बीच की अरेंज मैरिज पर गौर
करें तो ये लगभग असंभव जान पड़ता है। फिर भी इस पूरे तर्क में एक सिरा तो
मजबूती से निकलकर आता ही है कि सरोकार, सूचना और जागरुकता के नाम पर जो जनहित
में जारी विज्ञापन सिनेमा में ठेले जा रहे हैं, उसकी प्रासंगिकता पर नये सिरे
से विचार हो… और तब लगे हाथ पॉलिटिक्स विहाइंड जनहित में जारी विज्ञापन पर भी
बात हो जाएगी। मुद्दा तो जरूरी और दिलचस्प है ही न।

मूलतः प्रकाशित- मोहल्लाlive

http://mohallalive.com/2013/09/25/cinema-and-morality-via-anubhav-sinha/
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