[दीवान]लप्रेकः कोई आस्तिक इतना मानवीय कैसे हो सकता है शांतनु !

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sat Sep 21 12:21:29 CDT 2013


तुम्हारी मां की बड़ी याद आती है शांतनु..उर्मि जब मोबाइल पर शांतनु से बात कर
रही थी तो लग रहा था, अब रो देगी..पास अगर शांतनु होता तो पक्का रुला देता..वो
बस इतना कहता- देख,देख..अब रोई उर्मि. अब रुकेगी नहीं और उर्मि पहले तो गला
दबा दूंगी तेरा कहती और फिर सचमुच रोने लग जाती. लेकिन
पिछले चार दिनों से मुंबई में फंसा शांतनु फोन पर ऐसा नहीं कर सकता था.उसने
पलटकर पूछा- तेरी सास तुझे याद आ रही है और मैं नहीं ?

शांतनु, सच कहूं..तुम जब भी मुझसे दूर होते हो, तुम्हें मिस्स तो करती हूं
लेकिन मांजी की बहुत याद आती है. तुम्हारा कहीं जाना होता कि इसके पांच-सात
दिन पहले से मेरे साथ होती. इस बीच तुम कब चले जाते, बहुत पता नहीं चलता. रात
होते अपने कमरे में जाती तो देखती कि उन्होंने ऑलआउट लिक्विड हटाकर मच्छरदानी
लगा दी है और फिर..आ उर्मि, जरा मूव लगा दूं, घंटों कम्पूटर पर आंख गड़ाए बैठी
रहती है.
अच्छा तो सासू मां की याद इसलिए ज्यादा आती है कि वो सेवा-सत्कार करती
थी...सेवा-सत्कार वैसे मैं भी तो कम नहीं करता..सेल्फिश
उर्मि..सेल्फिश,सेल्फिश...

हो गए न शुरु शांतनु..नहीं इसलिए नहीं..मैं तुम्हारे न होने पर मैं अक्सर
सोचती हूं..मांजी की भी तो खानदान की इज्जत थी, उनका भी तो पूरे इलाके में नाम
था..फिर तुमने बिना उनके चुने,पसंद किए मुझसे शादी कर ली तो उन्हें भी तो
थोड़ी ही सही,चोट पहुंची होगी, सो कॉल्ड इज्जत गयी होगी..लेकिन वो हमेशा, जब
तक जीवित रही, ये अहसास कराने में क्यों लगी रही कि मैं तुम्हारी सास नहीं मां
हूं. वो भी तो मुझे सता सकती थी, तुम्हें बेदखल कर सकती थी. पता है दिनभर में
अगर वो बीस बार मुझसे बात करती तो इक्कीस बार कहती- बच्चा, हम तुम्हारे जैसा
कम्पूटर औ इ भारी-भारी किताब तो नहीं पढ़े लेकिन हम बस एतना जानते हैं कि जब
जोड़ी उपर से ही बनके आता है तो उसमे हम हाड-मास का आदमी क्या बिगाड़ सकते
हैं..पचास रहस्य तो ऐसे बताए होंगे जिसके पहले कहा करती- शांतनु को किसी भी
तरह से मत बताना..यार, कोई आस्तिक पॉलिटिकली इतना इनकरेक्ट होकर भी इतना
मानवीय कैसे हो सकता है, मैं अक्सर उनके इस अंदाज से बेचैन रहती.

उन्हें पता था कि मैं इन गहने-जेवर के चक्कर में नहीं पड़ती और न ही उनके
ठाकुरजी की सेवा-श्रद्धा ही कर सकूंगी..फिर भी, पता है क्या किया शांतनु अपने
आखिरी दिनों में. ठाकुरजी की सोने की छोटी सी मूर्ति गलाकर दिलवाली एपेंडेंट
बनवा दिया..और ये जो तू उस पर एस लिखा देखकर कमेंटबाजी करता है,
फिल्मी-फिल्मी..उर्मि सबकुछ तूने ठीक किया बस जूही चावला जैसी रस्सी लटाकर घर
से भागकर शादी करती तो हमारी कहानी भी नाइनटीज की मिसाल बन जाती..उस दिन अचानक
से ही पूछा था- अच्छा बच्चा, शांतनु का पहिला अच्छर अंग्रेजी में कैसे लिखते
हैं. मैंने लिखा और उसने पर्स में संभाल लिए थे.

उर्मि, ऐ उर्मि..तू स्साली पक्का सेंटी होकर रोने लगी होगी..अब दरवाजा खोलेगी
या फिर मैं रात के डेढ़ बजे कॉल बेल बजाउं..खोल तो दरवाजा, देखूं तो तेरे भीतर
का समंदर आंखों में स्वीमिंग पूल बनकर कैसे डिस्प्ले हुआ है..

( लप्रेकः सास-बहू सीरियल की इमेज से बेदखल एक सास के लिए)
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