[दीवान]कुछ के लिए हिन्दी फुलक्रीम दूध है, बाकी के लिए सपरेटा

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sat Sep 14 03:33:40 CDT 2013


हिन्दी नाम के फुलक्रीम दूध पीकर सप्ताह भर से पखवाड़े में ताल ठोकनेवाले
मठाधीशों से एक बार ये सवाल जरुर पूछिएगा कि आकाशवाणी से लेकर निजी चैनलों में
हिन्दी के नाम पर जो कम पैसे दिए जाते रहे हैं, उससे हिन्दीकर्मियों की सेहत
पर क्या असर पड़ता है ? दूसरी तरफ दो-चार उन शिक्षकों से भी हिन्दी के संबंध
में राय ले लीजिएगा जिनकी क्लास बचाए रखने के लिए ऐसे-ऐसे विषय के छात्रों को
पकड़कर हिन्दी पढ़ाई जाती है, जिसने पैदा लेते ही इस भाषा को अपने जीवन से
निकाल फेंकने की कसम खा ली थी..बोलने पर आपको चुराटी लगेगी लेकिन
सरिया,बालू,सीमेंट की तरह ही ज्ञान और मनोरंजन उद्योग में हिन्दी और भाषा एक
निवेश है..जिस सेक्टर में इससे राजस्व मिलेंगे,वहां हिन्दी फुल क्रीम हो
जाएगी, जहां नहीं चलेगी वहां डबल टोन्ड..और अकादमिक दुनिया में सपरेटा यानी
खट्टी बासी दही..बाकी कुछ महंतों को "हिन्दी फुल क्रीम" पीकर ताल ठोंकने
दीजिए..आप उनके कहे और लिखे को जो कालजयी बता रहे हैं और उन्हें हिन्दी के
सपूत तो प्रहसन पर अधिकार सिर्फ मेरा नहीं है. दरअसल फुलक्रीम से वैसे भी गैस
ज्यादा बनता है. हिन्दी बचाने के नाम पर या तो महंत सामंत के जिन्न बचाना
चाहेंगे या रिवायटल बनाने के फेर में बाजार की गोद में गिरेंगे. एक स्वायत्त
ज्ञान की भाषा बनाने के लिए हिन्दी में कोई कुछ नहीं कहेगा, करेगा..वो हल्के
से अंग्रेजी की तरफ सरक लेगा.
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