[दीवान]बैकुंठ में बापू

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Sep 2 11:57:43 CDT 2013


1. बैकुंठ के चौदह दिन, कारावास में उपवास, सलाखों में साधना, जेल में हरिओम,
बापू का वैराग्य....अगले चौदह दिनों में आसाराम को लेकर चलनेवाली न्यूज चैनलों
की स्टोरी की ये थीम और स्लग है..पूरी उम्मीद है कि इस दौरान न्यूज चैनल
आसाराम की ऐसी ही और इसी के आसपास छवि बनाने की कोशिश करेंगे जिससे कि सबकुछ
जल्द ही सामान्य हो जाएग. हजारों भक्तगणों की आवारा हो चुकी, भटकी आस्था
धीरे-धीरे वापस आ सके. वैसे भी कल एबीपी न्यूज उसके बचपन की गाथा को जिस अंदाज
में दिखा रहा था, आगे वासुकी का रुप देने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा..चैनलों
ने इस बीच जो कई किसिम के पर्यायवाची शब्द इजाद कर लिए थे, सब एक-एक करके
बिलाते चले जा रहे हैं और फिर धीरे-धीरे बापू की तरफ लौट रहे हैं. बाबा के
"निर्मल" होने की ये स्वाभाविक प्रक्रिया है.

2.आप भूल जाइए कि आसाराम के विरोधियों ने, उसके आलोचकों ने, शरद यादव जैसे
नेता और मीडिया ने उसके साथ क्या किया, कैसे खिलाफ में माहौल बनाया..बस एक बार
सिलसिलेवार ढंग से उसकी उन तमाम ड्रामेबाजी, ओछेपन पर गौर कीजिए और मैट्रिक तक
पढ़ी गई किसी भी किताब से एक संत के चरित्र से मिलान कीजिए, तब आप इस नतीजे पर
पहुंचिए कि उसके साथ कुछ भी किया गया वो जरुरी है या नहीं, ये काम बहुत पहले
हो जाना चाहिए था या नहीं ? आसाराम को उसके विरोधियों ने नहीं, उसके चरित्र और
व्यवहार ने उसे संत के बजाय एक औसत दर्ज के गएगुजरे इंसान के दर्जे में डाला
है. कल को उसके निर्दोष साबित होने के बावजूद स्क्रीन पर जो व्यवहार करता
दिखा, वो उसे संत तो दूर, ठीकठाक इंसान होने में शक पैदा करेगा.
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