[दीवान]Fwd: सिविल सर्विस की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं के साथ भेदभाव करने वाली नीति वापस लो

A. Kumar ak403 at cam.ac.uk
Mon Mar 18 06:48:22 CDT 2013


भारतीय भाषाओं के प्रति ऐसी विमुखता दर्शाती है कि मध्यम वर्गीय अपने लिए इतनी तादाद में 
निजि अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल बना चुके हैं कि अब उन्हें उन कमज़ोर वर्गों के प्रति कोई संवेदना 
नहीं बची है जो अन्य भारतीय भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं। इसको जड़ से ख़त्म करने का सुलभ 
तरीका यही बचता है कि भारतीय भाषाओं के विकल्प को परीक्षाओं के लिए समाप्त कर दिया 
जाए। यह गंभीर चिंता की बात है। यह उन तमाम वर्गों के साथ बड़ा भारी अन्याय और धोखा 
होगा जो भारतीय भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं। मुझे लगता है कि इसके ख़िलाफ़ एक लम्बी 
मुहिम चलाने की ज़रूरत है। अन्यथा पश्चिमी हितों के लिए काम करने वाली यह सरकार भविष्य में 
वे सभी रास्ते बंद करने की योजनाएं बनाएगी जिसके द्वारा कमज़ोर वर्गों के बच्चे बेहतर रोज़गार 
पा सकें।

आपका,
ऐश्वर्ज

On Mar 18 2013, Ravikant wrote:

>हलाँकि सरकार ने फ़िलहाल इस आदेश को स्थगित कर दिया है, लेकिन दबाव बनाये रखने
>की ज़रूरत है ताकि वे इस रूप में तो लागू नहीं ही किया जा सके। कृपया
>हस्ताक्षर करें और अपने मित्रों से भी कहें। अगर और जानाकरी चाहिए तो ये
>देखें:
>
>  
> http://www.thehindu.com/opinion/op-ed/how-upsc-got-its-english-wrong/article4519242.ece?homepage=true
>
>शुक्रिया,
>रविकान्त
>
>---------- Forwarded message ----------
>From: Yogendra Yadav <yogendra.yadav at gmail.com>
>Date: 2013/3/17
>Subject: सिविल सर्विस की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं के साथ भेदभाव करने
>वाली नीति वापस लो
>To: Chandan Srivastawa <chandan at csds.in>, Apporva Anand <
>apoorvanand at kafila.org>, Satish Deshpande <sdeshpande7 at gmail.com>,
>Tejaswini Niranjana <teju at cscs.res.in>, Chandan Gowda <
>chandangowda at gmail.com>, Rajaram Tolpadi <rtolpadi at rediffmail.com>, Amlan
>Dasgupta <amlan04 at gmail.com>, suhas palshikar <suhaspalshikar at gmail.com>,
>"K.C. Suri" <surikc at gmail.com>, Sabyasachi Basu Ray Chaudhury <
>sabyasachi at mcrg.ac.in>, abhay dubey <abhaydube2001 at yahoo.com>, Ravi Kant <
>ravikant at csds.in>, Rakesh Pandey <rakeshkpandey at csds.in>
>Cc: Nilesh Buddha <nileshbuddha at hotmail.com>, Pankaj Pushkar <
>pankaj.pushkar at gmail.com>, medha pushkar <medhaonline at gmail.com>
>
>
>कृपया बतायें कि क्या आप नीचे लिखे वक्तव्य पर हस्ताक्षर करना चाहेंगे? अगर
>> उचित समझें तो इस वक्तव्य को लेखकों-बुद्धिजीवियों के पास ईमेल के सहारे आगे
>> बढ़ायें और उनमें से जो इस वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमत हैं उनके
>> नाम हमारे पास भेजें। यह वक्तव्य अंग्रेजी में  वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। आप
>> वहां जाकर भी क्लिक से हस्ताक्षर कर सकते है।
>>
>
>  
> http://www.change.org/en-IN/petitions/union-public-service-commission-government-of-india-do-not-discriminate-against-indian-languages-in-the-civil-services-exam
>
>
>>
>>
>> *सिविल सर्विस की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं के साथ भेदभाव करने वाली नीति
>> वापस लो*
>>
>>
>>
>> संघ लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा का ढर्रा बदलने का फैसला किया है और
>> यह बदलाव भारतीय भाषाओं के साथ व्यवस्थित रुप से भेदभाव करता है। हम सब लोग,
>> जिनके नीचे हस्ताक्षर हैं, संघ लोकसेवा आयोग के फैसले में छुपे नीतिगत बदलाव
>> के गहरे संकेत से दुःखी हैं। शुक्र है कि यह मामला लोकसभा में उठाया गया और
>> आयोग का फैसला “फिलहाल के लिए स्थगित” कर दिया गया है। लेकिन इतने भर से काम
>> नहीं चलने वाला। जरुरत ऐसे सारे बदलाव को पूरी तरह से पलटने और उस मानसिकता को
>> समझने और टोकने की है जो नाइंसाफी और भेदभाव भरी ऐसी नीतियों को जन्म देती है। य़ह
>> नीति स्वराज और लोकतंत्र के
>> उस भाव के विपरीत है जिससे हमारा गणराज्य अनुप्राणित है।
>>
>>
>>
>> संघ लोकसेवा आयोग ने परीक्षा की जो नई योजना बनायी है और जिस पर सरकार ने बस
>> तात्कालिक तौर पर रोक लगायी है, वह भारतीय भाषाओं पर चौतरफा हमला करती है।
>> पहले भारतीय भाषाओं में से किसी एक में परीक्षा पास करना जरुरी होता था। एक
>> तो, इसे खत्म कर दिया गया है। दूसरे, अंग्रेजी के अनिवार्य प्रश्नपत्र में
>> प्राप्त अंक अब अंतिम चयन के अंकों में जोड़े जायेंगे। तीसरे, एक अनोखी शर्त
>> यह रखी गई है कि वैकल्पिक प्रश्नपत्र के रुप में साहित्य को चुनना हो तो
>> परीक्षार्थी का उस विषय में विशेष योग्यता के साथ स्नातक होना जरुरी है, बाकी
>> किसी विषय के लिए ऐसी शर्त नहीं रखी गई है।यही नहीं, पहले संघ लोक सेवा आयोग
>> सिविल सिर्विस की परीक्षा में आठवीं अनुसूची की सारी भाषाओं को परीक्षा के
>> माध्यम के रुप में स्वीकार करता था। लेकिन अब इस विधान पर दोहरी शर्त लाद दी
>> गई है। एक तो परीक्षार्थी ने अपनी परीक्षा के लिए माध्यम के रुप में जिस भाषा
>> को चुना है वही भाषा स्नातक-स्तर पर उसके उत्तीर्ण होने की भाषा होनी चाहिए।
>> दूसरे सिविल सेवा की परीक्षा में कम से कम 25 परीक्षार्थी ऐसे होने चाहिए
>> जिन्होंने उस भाषा को अपनी परीक्षा के माध्यम के रुप में चुना हो।
>>
>>
>>
>> ऐसा कहा जा रहा है कि यह  बदलाव जरुरी थे ताकी जारी प्रावधानों के दुरूपयोग
>> पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन आयोग की अपनी रपट से यह  साबित नहीं होता। मान
>> लिया गया है कि कई अन्य विषयों की तरह ,कोई विद्यार्थी वैकल्पिक विषय के रुप
>> में किसी खास भाषा के साहित्य को  इसलिए चुनता है क्योंकि उस भाषा के साहित्य
>> का प्रश्नपत्र तुलनात्मक रुप से ज्यादा ‘आसान’ और अंकदिलाऊ है। लेकिन यह बात
>> हर भाषा के साहित्य के प्रश्नपत्र के साथ लागू नहीं होती। फिर, अगर ऐसी कोई
>> कमी दिख पड़ती है तो बेहतर है कि उसका समाधान परीक्षा के लिए तय पाठ्यक्रम को
>> बदलकर, प्रश्नपत्र की बुनावट और उत्तरों के मूल्यांकन के तरीके पर नियंत्रण
>> रखकर किया जाय ना कि वैसी बाधाएं खड़ी करके जैसी संघ लोकसेवा आयोग भारतीय
>> भाषाओं के मामले में कर रहा है। यह तर्क तो और भी दोषपूर्ण है कि “व्यावहारिक
>> आसानी” को ध्यान में रखते हुए ये बदलाव किए गए हैं। संघ लोक सेवा आयोग की
>> प्रशासनिक आसानी को अपने देश के विविध भाषायी समुदायों की बुनियादी जरुरतों के
>> ऊपर तरजीह देना गैर लोकतान्त्रिक है। याद रहे कि भाषायी समुदायों को संवैधानिक
>> सुरक्षा हासिल है। संघ लोकसेवा आयोग का यह फैसला भूमंडलीकृत दुनिया में
>> अंग्रेजी से जान-पहचान को बढ़ावा देनेवाला फैसला नहीं है बल्कि बहु-भाषिकता से
>> परिभाषित होने वाली एक सभ्यता के भीतर एकभाषी अभिजन गढ़ने की कोशिश है। यह
>> फैसला प्रतिभा को पुरस्कार देने वाला नहीं बल्कि भावी सविल सर्वेंट के चयन के
>> सामाजिक दायरे को जान-बूझकर छोटा करने की कोशिश है।
>>
>>
>>
>> यदि संघ लोक सेवा आयोग का यह  फैसला पलटा नहीं गया तो इस फैसले का दुष्प्रभाव
>> आठवी अनुसूची की सारी भाषाओं पर पड़ेगा। आयोग के हाल के सालों के आंकड़े बताते
>> हैं कि अगर कम से कम 25 परीक्षार्थियों द्वारा किसी भाषा को परीक्षा की
>> माध्यम-भाषा के रुप में रखना अनिवार्य बना दिया जाय तो इससे तीन-चार भाषाओं को
>> छोड़कर संघलोक सेवा आयोग की परीक्षा में अन्य किसी भाषा का अस्तित्व ही ना
>> बचेगा। भाषायी दक्षता के बारे में आयोग ने जो अन्य फैसले लिए हैं उससे
>> हिन्दी सहित आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी  भाषाओं को बराबर की चोट पहुंचेगी।
>> दरअसल इस मुकाम पर सारी देसी भाषाएं अंग्रेजी के प्रभुत्व के खिलाफ खड़ी हैं
>> और यह वक्त भारतीय भाषाओं की एकता की दावेदारी का वक्त है।
>>
>>
>>
>> सरकारी नौकरियों में नियुक्ति की शीर्ष-संस्था की तरफ से आने वाला संदेश
>> बड़जोर और साफ है। भावी प्रशासकों को अंग्रेजी में सिद्धहस्त होना होगा और देश
>> की 99 फीसदी आबादी जिन जबानों को बोलती है उसकी काम-चलाऊ जानकारी भी उनके लिए
>> जरुरी नहीं है। जब तक संघलोक सेवा आयोग का फैसला पूरी तरह से हटा नहीं लिया
>> जाता तब यह फैसला उस बहुसंख्यक छात्र-समुदाय के विरुद्ध काम करता रहेगा जो
>> उच्चशिक्षा में परीक्षा और पढ़ाई की माध्यम भाषा के रुप में किसी भारतीय भाषा
>> को चुन रहे हैं।यह फैसला लोकतंत्रीकरण के तर्क के विपरीत भी काम करेगा क्योंकि
>> इसमें भावी प्रशासकों के सामाजिक आधार को अंग्रेजीदां अभिजन के पक्ष में
>> सिकोड़कर छोटा कर दिया गया है।सबसे बड़ी बात यह कि संघ लोकसेवा आयोग का फैसला
>> भारतीय भाषाओं के सांस्कृतिक संसाधनों का अवमूल्यन करता है और उस पर अंग्रेजी
>> की विपन्न एकभाषिता को तरजीह देता है।
>>
>>
>>
>> हमारी मांग है कि संघ लोकसेवा आयोग अपने फैसले को पूरी तरह से वापस ले। इसकी
>> जगह, पहले से चले आ रहा प्रावधान को, कि किसी भारतीय भाषा की कामकाजी जानकारी
>> जरुरी है, आगे बढ़ाते हुए उसमें दक्षता की सीमा तक ले जाया जाना चाहिए।जो
>> परीक्षार्थी परीक्षा की माध्यम भाषा के रुप में किसी भारतीय भाषा को चुनते हैं
>> उन्हें प्रश्नों पत्रों का बेहतर अनुवाद मुहैया कराया जाना चाहिए, साथ ही
>> सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि परीक्षक भी उस भाषा में सिद्धहस्त हो।
>>
>>
>>
>> यह प्रकरण देश के नीति-निर्माताओं की अंग्रेजीपरस्त मानसिकता पर एक व्यापक
>> बहस की मांग करता है। साथ ही सार्वजनिक जीवन में भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा
>> के लिए के एक बड़ा अभियान चलाने की जरुरत का रेखांकन करता है।सभी लोकतंत्र-मना
>> देशवासियों, खासकर विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखक और शिक्षकों से हम  आह्वान
>> के स्वर में कह रहे हैं कि वे इस अभियान से जुड़ें और एकजुट हों।
>>
>> अब तक जिनके हस्ताक्षर हो चुके हैं:
>
>यू आर अनंतमूर्ति,  टी एस सत्यनाथ, हरीश त्रिवेदी, के सच्चिदानन्द,
>अपूर्वानंद, तेजस्विनी निरंजना , सतीश देशपांडे, चन्दन गौडा,चन्दन श्रीवास्तव,
>पंकज पुष्कर,  राकेश पाण्डे, योगेन्द्र यादव
>




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