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Wed Mar 20 06:23:32 CDT 2013


युवा शोध समवाय-9

विषय: “हिंदी वर्चस्व बनाम मैथिली अस्मिता”.
प्रस्तुतकर्ता: मिथिलेश कुमार झा,
शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय,
राजनीति विज्ञान विभाग.
अध्यक्षता: मोहिंदर सिंह,
प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान विभाग,
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली.
परिचर्चा: कमलनयन चौबे,
प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान विभाग,
दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय.
स्थान: कक्ष संख्या 15, कला संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय.
दिनांक: 22 मार्च 2013, दिन: शुक्रवार,
समय: 2 बजे से.
निवेदक: युवा शोध समवाय.

संगोष्ठी पत्र का सार:

आधुनिकता के साथ दुनिया के हर समाज में कुछ आमूल-चूल परिवर्तन आये हैं. उनमे
से एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है राष्ट्र राज्य का एक विचार के रूप में उदय और
तथा प्रसार और उसके साथ एक राष्ट्र भाषा का विकास. हालाँकि उत्तर आधुनिकता के
इस युग में इस तरह के निर्माण व बनावट की व्यापक आलोचना की जा रही है. इसकी
उपयोगिता को लेकर भी कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं. एक वैकल्पिक समाज के
निर्माण की बात भी की जा रही है, लेकिन राष्ट्र राज्य का विचार अभी भी
प्रासंगिक बना हुआ है, और आज भी दुनिया के बहुत से समुदायों को आकर्षित करता
है.

भाषा का प्रश्न राष्ट्र के प्रश्न के साथ अभिन्न रूप से जुडा हुआ है. किसी भी
राष्ट्र की कल्पना बगैर एक भाषा के, जिसे उस राज्य में रहने वाले लोग समझ
सकें, बोल सकें, संभव नहीं माना जाता है. और हर समाज में इस तरह के भाषा का
निर्माण का प्रयास अंतर्विरोधों से भरा हुआ रहा है, चाहे इंग्लैंड में
अंग्रेज़ी का प्रश्न हो, फ्रांस में फ्रेंच का प्रश्न हो या फिर स्पेन में
स्पैनिश का प्रश्न. यूरोप में भी इस तरह के प्रयास की शुरुआत 19वीं शताब्दी
में ही होती है. जैसा कि सीटन वाटसन मानते हैं- यूरोप तथा इसके नजदीकी
पेरिफरिज में उन्नीसवीं शताब्दी देशीय भाषाओँ के कोश रचयिता (Lexicographers),
(Vernacular) वैयकरणों (Grammarians), भाषा विशेषज्ञों (Philologists), तथा
लेखकों और कवियों (Literatures) के लिए स्वर्णिम युग था.

भारत एक बहुभाषी देश है. यहाँ के कई भाषायी समुदायों की अपनी अलग विशिष्टता,
कला, संस्कृति तथा इतिहास है. इनका सम्बन्ध राष्ट्रभाषा हिंदी से हमेशा सहज
नहीं रहा है, खासकर भारत के उस भाग में जिसे हिंदी प्रदेश के नाम से जाना जाता
है. प्रस्तुत आलेख मैथिली के सन्दर्भ में राष्ट्रीय भाषा हिंदी का प्रभाव तथा
इसमें मैथिली विमर्श को समझने का एक प्रयास है. इसमें मेरा प्रयास है हिंदी
भाषा का एक राष्ट्रीय भाषा के रूप में उदय तथा प्रसार एवं इसका प्रभाव एक अन्य
भाषा मैथिली के, जिसे वर्षों तक बोली समझा जाता था, के साथ के संबंधों को कैसे
समझा जा सकता है? मैथिली ने कहाँ तक और क्यों तथा किन परिस्थितियों में इसका
समर्थन या विरोध किया है? किन कारणों से हिंदी का विरोध हुआ है, विशेषकर हिंदी
प्रदेश के भीतर भी? क्या भाषा किसी समाज या राष्ट्र के विकास का अध्ययन करने
का एक उचित माध्यम हो सकती है?

-- 
Amitesh
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