[दीवान]भारतीय भाषाएं

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Mon Mar 18 02:31:44 CDT 2013


*हालांकि यह लेख हफ्ता भर पहले लिखा था। अब जब दीवान पर भी बात चली है तो
पोस्ट कर रहा हूं...*

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*भारतीय भाषा को दर-बदर करने की कोशिश*

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 “कुछ समय पहले एक इंटरव्यू में था तो एक दलित लड़की ने तेलुगु में इंटरव्यू
दिया था। उसकी प्रतिभा का जवाब किसी के पास नहीं था, लेकिन वो अंग्रेजी नहीं
जानती थी। अब वैसे लोगों का क्या होगा। ये एक किस्म की नए तरह की औपनिवेशिकता
है जो समझती है कि अंग्रेजी ही भवसागर पार करा सकती है।” यह बात अशोक वाजपेयी
ने कही है। वे आगे कहते हैं, “मेरे समय लोकसेवा प्रतियोगिता परीक्षा के लिए
अंग्रेजी भाषा ही थी। भारतीय भाषाएं तो बाद में जुड़ीं। अब उन्हें परीक्षा से
हटाने का कदम बाधा पैदा करता है। आईएएस या आईपीएस काम तो राज्य में ही करेगा।
उसके लिए क्षेत्रीय भाषा जानना जरूरी है।” अशोक वाजपेयी का यह ख्याल बीबीसी
डॉट कॉम पर अंकित है, जो संघ लोक सेवा आयोग की नई परीक्षा प्रणाली पर गहरे
सवाल उठाता है। वाजपेयी अंग्रेजी साहित्य के विद्यार्थी रहे हैं। हिन्दी के
प्रसिद्ध कवि हैं और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं।


खैर, एक रोचक घटना है। उसे जानना भी उचित रहेगा। भारत आजाद हुआ तो बीबीसी ने
तत्काल महात्मा गांधी से उनकी प्रतिक्रिया चाही। वे टालते गए। आखिरकार
उन्होंने कहा, “दुनिया को बता दें कि गांधी आज से अंग्रेजी भूल गया।” यह
विडंबना ही है कि जिस भारत को गांधी के सपनों का देश बनाने की बात दिन-रात
होती है, वहां का जिला कलेक्टर बनने के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में
शामिल किसी भी भारतीय भाषा के ककहरे को जानना जरूरत नहीं है। हां, यह शर्त
जरूर लागू है कि कोई अभ्यार्थी कलेक्टर बनने की ख्वाहिश रखता है तो वह
अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान रखे। यकीनन, यह अपने-आप में हास्यास्पद है। काफी पहले
शाहजहां रोड पर संघ लोक सेवा आयोग के सामने लंबा धरना इसलिए चला था कि उसकी
परीक्षाओं में हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं को जगह दिलवाई जा सके। उस धरने
में बड़े-बड़े राजनीतिक नेता आए। वह संघ लोक सेवा आयोग को जनाभिमुख बनाने का
एक अभियान था। पर 2011 में गठित अरुण निगवेकर समिति की सिफारिशों को मानकर
सरकार ने उसपर पानी फेर दिया है। इससे अभ्यार्थियों में असंतोष पनप रहा है। वे
खेमे में बंट रहे हैं।


सिविल सेवा परीक्षा में अपने दूसरे अवसर का उपयोग करने जा रहे एक अभ्यार्थी ने
कहा, “नए नियमों से जाहिर होता है कि संघ लोक सेवा आयोग एक रणनीति के साथ
भारतीय भाषाओं को दरकिनार करने में जुटा है। आप देखिए, भारतीय भाषाओं के दो सौ
अंक वाले अनिवार्य परचे को हटा लिया गया है। इससे अंग्रेजी माध्यम के छात्र को
बड़ी सुविधा मिली है। वहीं अंग्रेजी के सौ अंक के परचे को जोड़ा गया है।
तुर्रा यह कि इसके अंक अंतिम मूल्यांकन में भी जोड़े जाएंगे।”  उक्त अभ्यार्थी
ने कहा कि जहां एक-एक अंक महत्वपूर्ण होता है, वहां इससे अंग्रेजी माध्यम के
अभ्यार्थियों को काफी लाभ पहुंचेगा। मेरे मन में यह सवाल है कि आयोग भाषा को
लेकर दोहरा रवैया क्यों अख्तियार कर रहा है? गौरतलब है कि पहले दो-दो सौ अंक
के अंग्रेजी और आठवीं अनुसूची में शामिल किसी भी भाषा में एक पेपर लिखना होता
था। इसमें सिर्फ पास होना अनिवार्य था। इसके अंक अंतिम मूल्यांकन में नहीं
जोड़े जाते थे। नए नियम से धारा बदल गई है। अब यह भी कहा जा रहा है कि कोई भी
अभ्यार्थी तबतक किसी क्षेत्रीय भाषा में परीक्षा नहीं दे सकता, जबतक अन्य 24
अभ्यार्थी इस भाषा में परीक्षा न दे रहे हों। आयोग का यह नियम अभ्यार्थी के
मौलिक अधिकार पर चोट करने वाला है। वह अपनी सुविधा के मद्देनजर अभ्यार्थियों
को सीमा में बांध रहा है।  ऐसे नियमों से अभ्यार्थी उत्तेजित हो रहे हैं।


वहीं अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की भिन्न राय है। एकबारगी वे मानते हैं कि नए
नियमों से हिन्दी व दूसरी भारतीय भाषाओं के अभ्यार्थियों की मुश्किलें बढ़ी
हैं, लेकिन यह अखिल भारतीय परीक्षा है। ऐसे में अंग्रेजी के महत्व को नकारा
नहीं जा सकता है। भाषाई समझ से जुड़े सवाल पर प्रतिभा कहती हैं, “अकादमी में
ट्रेनिंग के दौरान भाषाई ज्ञान दिया जाता है। जिस अभ्यार्थी का चयन जिस कैडर
में हुआ है, उसे वहां की भाषा सिखाई जाती है।” पर एक सवाल तो यह भी खड़ा होता
है कि क्या भाषा और उस भाषाई समाज के प्रति मुकम्मल दृष्टि कुछेक महीने में
बनाई जा सकती है? वैसे अंग्रेजी माध्यम के संवेदनशील छात्र मानते हैं कि आज
भाषाई स्मिता का संघर्ष पुरानी बात हो गई है। वह सिर्फ हवा में है। सरकार के
पास इस बाबत कोई कार्य योजना नहीं है। ऐसे में जो कुछ है, वह हाथी के दिखाने
वाले दांत भर हैं।


इस मसले पर हिन्दी के जाने-माने विद्वान नित्यानंद तिवारी ने कहा कि भारतीय
भाषाओं को कैसे हटाया जाए और अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहे, इसी साजिश के साथ
काम किया जा रहा है। जिन्हें समाज-दर्शन का इल्म नहीं है, आज वे निर्णय कर रहे
हैं। आगे उन्होंने कहा, “आज देश में कोई स्टेट्समैन नहीं है। जब स्टेट्समैन ही
नहीं है तो कोई ऐसी नीति नहीं बन सकती जो जनहित में हो। नीतियों को
कार्यान्वित करने वाले देश चला रहे हैं।” नाम न लेने की शर्त पर राजस्थान कैडर
के एक अधिकारी ने बताया कि ग्रामीण और क्षेत्रीय भाषा की पृष्ठभूमि वाले
अभ्यार्थियों के लिए सिविल सेवा परीक्षा अब अधिक चुनौतिपूर्ण हो गई है। वे यह
मानते हैं कि नया पाठ्यक्रम उत्तम प्रशासनिक अधिकारी की खोज करने में सक्षम
है। साथ ही प्रशासनिक सुधार को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता भी दर्शाता है,
लेकिन यहां भाषाई भेद-भाव का उभरकर आना गलत संदेश देता है। इसने सकारात्मक
कोशिशों पर पानी फेर दिया है। संघ लोक सेवा आयोग के खिलाफ अदालत से लेकर सड़क
तक संघर्ष कर रहे चितरंजन कुमार कहते हैं, “आयोग में बैठे लोग अभ्यार्थी का
कोई ख्याल नहीं रखते हैं। वे उन्हें झांसा देते हैं। सूचना के अधिकार कानून के
तहत भी गलत जानकारी उपलब्ध कराते हैं। मेरे पास इसके दस्तावेज हैं। यह मेरा
निजी अनुभव है। वे उन्हीं लोगों का चयन करना चाहते हैं, जो उनकी जबान और अंदाज
में बातचीत करते हैं। भारत का ग्रामीण समाज डीपी.अग्रवाल को पसंद नहीं है।” वे
कहते हैं कि इसी बात को ध्यान में रखकर नया नियम लागू किया गया है।


यह भी माना जा रहा है कि आयोग के नए पाठ्यक्रम ने कोचिंग के व्यवसाय को हवा दी
है। एक कोचिंग संस्थान के निदेशक ने बताया कि अब कोचिंग का सहारा लेना
अभ्यार्थियों की मजबूरी हो जाएगी। इसके लिए उन्हें काफी पैसे भी खर्च करने
होंगे। यह पिछड़े इलाकों व गरीब लोगों के लिए असंभव होगा। गौरतलब है कि सिविल
सेवा परीक्षा के कोचिंग का व्यवसाय हजारों करोड़ रुपए का है। इससे काल घन भी
खूब पैदा हो रहा है। अब उसके और परवान चढ़ने की उम्मीद है।
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