[दीवान] (no subject)

amitesh kumar amitesh0 at gmail.com
Sun Jun 30 03:14:27 CDT 2013


हमारे टोले को उस टोले के लोग थोड़ा कमतर मानते हैं और यह पूर्वाग्रह उस टोले
में निवास करने वाली सभी जातियों का हैं. आखिर गाँव के भूतपूर्व सामंत और
‘दर’बार का वह टोला था, जिसमें एक पोस्ट ऑफ़िस था, पुस्तकालय था, स्कूल था,
मंदिर था, माई स्थान था, स्वतंत्रता सेनानी थे, पान दुकानदार थे, पत्रकार थे
और एक पूर्वमुखिया भी. हमारे टोले में संपन्न, शिक्षित, नौकरीपेशा लोगों की
संख्या कम थी या नहीं के बराबर थी. शक्ति प्रतिष्ठान भी नहीं थ, ले दे कर एक
मसजिद और कुछ आटा पिसने की चक्कियाँ थी.
उस टोले की टीम जब भी नाटक खेलती और पात्र बंटवारा करती तब हमारे टोले के
लड़कों को कमतर रोल दिया जाता. अधिकतर नायिका का, नौकर का,बुढे का या अन्‍य
हास्य किरदारों का. इस उपेक्षा के प्रतिशोध में टोले के लड़के किताब उस टोले से
ले कर आये थे और बुनाद की दुकान पर तराजु छू कर कसम खाई थी कि नाटक होगा
http://www.sarokar.net/2013/06/amitesh-village-theater/

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Amitesh
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