[दीवान]जारी है- उत्तराखंड रियलिटी शोः फेसबुक अपडेट्स

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Jun 24 02:53:24 CDT 2013


1. उत्तराखंड की त्रासदी को लेकर मीडिया ने अब तक क्या चंडूगिरी की और जो कि
अहर्निश जारी है, आप सब लगातार देख रहे है..लेकिन चैनल के संपादकों की छाती
गर्व से फुली जा रही है..आप बात कीजिए तो जरा उनसे और कीजिए आलोचना, पहले तो
लकड़ी के कायले की तरफ जलती लाल आंखों से देखेंगे और फिर आपकी काया को भुट्टे
की तरह चबाने के अंदाज में जबड़े भींचेंगे..मीडिया अगर नत्था बनाकर भी
पीड़ितों को जान से मार दे तो भी ऐसे संपादकों की कमी नहीं है जो अपने
रिपोर्टर को चित्रगुप्त करार देकर इनाम बख्शेंगे.

2. मीडिया के लिए मौत और घोटाले एक समय के बाद संख्या पर आकर टिक जाते हैं. इन
दोनों की संख्या जितनी अधिक होती है, उन्हें कवरेज करने में उतना ही सुख मिलता
है क्योंकि ये दोनों ही स्थितियां हॉरर फिल्मों और सास-बहू सीरियलों के
मेलोड्रॉमा पैदा करने के स्कोप बनते हैं. मीडिया विश्लेषण की भाषा में हम
इन्हें "टीयर-जर्कर्स" कहते हैं..लेकिन कई हिन्दी चैनल ये भी न होकर
"टीयर-जोकर" बनकर पेश आते हैं...वो इतना भी नहीं समझ पाते कि अगर भीतर एप्रोच
औऱ सेंस नहीं है तो हजार लोगों के मरने पर भी आप संवेदना की जमीन मजबूत नहीं
कर सकते और अगर ये आपके भीतर मौजूद है तो एक सामान्य नागरिक के साथ हुई
हिस्सा,उत्पीड़न और आपदा भी पूरे देश को झकझोर सकता है,नाटक की शक्ल में नहीं,
ठोस मानवीय स्तर पर.
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