[दीवान]शिवकुमार मिश्र का जाना

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Fri Jun 21 01:16:12 CDT 2013


शिवकुमार मिश्र पूरे सप्ताह भर के लिए हमारे विभाग( हिन्दी विभाग,डीयू) में आए
थे. रोज सुबह दस बजे भक्तिकाल पर उनका व्याख्यान शुरु हो जाता..तब साहित्य से
लिखने-पढ़ने के स्तर पर काफी दूरी बनने गयी थी, खासकर अकादमिक स्तर के विमर्श
को लेकर लेकिन मैंने एक भी व्याख्यान मिस नहीं किया. सुबह से शाम तक बैठा
रहता. हमारे दिमाग में बस एक ही बात जमी थी- ये वही शख्स हैं जिनकी एम ए के
दिनों में "भक्ति आंदोलन और भक्तिकाव्य" पर लिखी किताब हमने पंक्ति-दर-पंक्ति
तीन-चार बार पढ़ी थी और लगभग पूरी किताब पेंसिल से रंग देने के बाद यूजीसी नेट
के वक्त दूसरी प्रति खरीदी थी..किसी भी समाजशास्त्री को उनकी ये किताब एक बार
जरुर पढ़नी चाहिए.

शिवकुमार मिश्र को अगर आप भक्तिकाल पर व्याख्यान देते सुनते तो आप ये बात
आसानी से समझ पाते कि क्यों चमकीले और नौकरी की आपाधापी मचानेवाले कोर्सों के
बीच कोई साहित्य पढ़ना चुनता है ? ये उन विरले वक्ता,अध्येता में से मुझे लगे
जिन्हें पढ़ने-सुनने के बाद आप अपना इरादा बदल सकते थे..हम जैसे हिन्दी
साहित्य से छिटके लोग वापस करीब आ सकते थे.

सुबह नहा-धोकर और बहुत ही शरीफ बच्चे की तरह कंघी करके( पीछे के घुमे हुए बाल
मुझे अब भी याद हैं) जब वो हमारे बीच आते और भक्तिकाल पर बोलना शुरु करते तो
लगता वो जो काम कर रहे हैं, उसके प्रति कितना गहरा लगाव और यकीन है उन्हें.
पेशे और काम के प्रति इतना यकीन बहुत कम लोगों को देखता हूं. इस बीच हममे से
कुछ लोग फुसफुसाते,आना-जाना करते लेकिन वो उसी भाव से अपनी बात रखते
जाते..उनके काम को देखते हुए अब ये बात अलग से कहने की जरुरत नहीं कि वो सच्चे
अर्थ में मार्क्सवादी थे, काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें ज्यादा
मार्क्सवादी बनाया था न कि मार्क्सवाद के मशीनी पाठ ने. हमें ऐसे साहित्य
अध्येता के खोने का गहरा दुख है..इनके हमसे दूर होने का मतलब हमारा साहित्य से
दूर होना है.
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