[दीवान]जनसत्ता में मेरा ब्लॉग

arvind das arvindkdas at rediffmail.com
Wed Jun 5 02:02:50 CDT 2013


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फालसे काले काले

तब हम बच्चे थे. माँ के पेट पर चिपके रहते. गर्मियों में बाहर जाने से रोकते हुए मां हमें अपने पास पकड़ कर रखती. पर थोड़ी देर में वो खुद सो  जाती. सोते हुए माँ के कानों में बड़े बड़े सोने के छल्ले अच्छे लगते थे.  बड़े भाई की जब शादी हुई तो भाभी के लिए वे वैसे ही छल्ले ढूंढ रहे थे...पर समय के साथ सोने में चमक और खनक दोनों ग़ायब होता गया. बहरहाल,  मां जब सो जाती तो हम उसके कानों के छल्ले को खोलते-खेलते थक जाते. फिर गर्मी से  बेपरवाह,  इधर-उधर देख, भाग जाते आम के टिकुलो की टोह में.



दिल्ली की इन गर्मियों में जब सुबह सबेरे नींद खुल जाती है और कानों में सुरीली ‘फालसे काले काले’  की आवाज़ सुनाई पड़ती है, मन जाने क्यूँ गाँव पहुँच जाता है. मैं फोन पर माँ से पूछता हूँ- क्या मिरचई अभी भी डुगडुगी बजाता, साइकिल पर 'बरफ' लेकर गाँव आता है?  बाड़ी में आम के टिकुले अब तो बड़े हो गए होंगे!  डबरे का पानी तो सूख गया होगा!



यायावर नागार्जुन ने लिखा है: “याद आता मुझे अपना वह तरौनी ग्राम/ याद आतीं लीचियां, वे आम/याद आते धान याद आते कमल, कुमुदनी और ताल मखान/ याद आते शस्य श्यामल जनपदों के रूप-गुण अनुसार ही रखे गए वे नाम”. तरौनी की जगह ‘बेलारही’  रख दीजिए. यह कविता मेरी हो जाएगी. वैसे तरौनी से मेरे गाँव की दूरी 20 किलोमीटर ही तो है, और ननिहाल?  महज चार. शायद हर प्रवासी की पीड़ा कहीं ना कहीं मिलती जुलती है. पहले नॉस्टेलजिया और फिर गहरा अवसाद!  



मार्च में हफ्तेभर के लिए गाँव गया था. पापा अपने स्वभाव के विपरीत शांत थे. उनकी युवोचित हँसी नहीं सुनाई पड़ रही थी. माँ से पूछा- पापा इतने चुप क्यों रहते हैं? पापा से पूछा- डिप्रेशन में तो नहीं हैं...? पापा ने कहा- नहीं. पर कुछ देर बाद कहा- ‘अब यह उम्र पोते-पोतियों के संग खेलने की है, अकेले रहने की नहीं...!  रिटारयरमेंट के बाद ऐसा लगता है कि सारी ऊर्जा खत्म हो गई. बूढ़ी दादी के पूछता हूँ- दिल्ली चलोगी?  वो कहती है- मरने के समय क्या मगहर जाउँगी?



90 के दशक में जब हम बिहार से दिल्ली पढ़ने आए थे उस वक्त बच्चों को दिल्ली पढ़ने भेजना मध्यवर्गीय परिवार के लिए एक तरह का ‘स्टेटस सिंबल’ था. जिनके पास भी थोड़ा-बहुत साधन था बच्चों को बाहर पढ़ने भेज दिया. और वे नौकरी-चाकरी के चक्कर में वहीं के होकर रह गए. बीस साल बाद अब दरभंगा-मधुबनी जिले के गाँव बूढ़ों का बसेरा बन गए हैं. बिहार में गाँवों में स्वास्थ्य और बिजली की सुविधा पिछले तीन दशकों में बमुश्किल सुधरी है. इन मूलभूत सुविधाओं के बिना बुढ़ापा एक रोग और भय की तरह आता है.



वीएस नायपाल के एक जुमले का इस्तेमाल कर कहें तो लालू-राबड़ी यादव के शासन के दौर में मीडिया में बिहार की छवि एक ऐसे राज्य की बन गई थी जहाँ ‘सभ्यता का अंत’ हो गया है. पर नीतिश कुमार के शासन काल में मीडिया में एक ऐसी छवि बन रही है कि बिहार जल्दी ही अपने ‘अतीत कालीन गौरव’ को पा लेगा. दोनों ही छवियाँ अतिरंजित और सच से परे हैं. मीडिया में इस समय सबसे ज्यादा जोर ‘जीडीपी’ के आँकड़ों, नीतिश की सेक्यूलर छवि और प्रस्तावित ‘नालंदा विश्वविद्यालय’ को लेकर है. पर जमीनी हकीकत बिहार के गाँव, खेत और खलिहानों में ही दिखता है,  चिकने-चुपड़े राष्ट्रीय राजमार्ग की सड़कों पर नहीं!



(जनसत्ता के समांतर स्तंभ में 5 जून 2013 को प्रकाशित)

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