[दीवान]क्या बाप को गरिआकर ही हमारा मनोरंजन होगा ?

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Wed Jun 12 02:16:00 CDT 2013


एक तरफ तो आनेवाले फादर्स डे को लेकर "प्रलोभनों के साथ पापा को" परिभाषित
करने की कोशिशें जारी है तो दूसरी तरफ "जीना है तो लिव इन में जीओ नहीं तो
मैरिज तो आपके बाप ने भी की थी, क्या उखाड़ लिया ?" जैसी पंक्तियां लगातार
प्रसारित हो रहे हैं. फीवर 104 एफ एम के लगातार दो साल नंबर वन बने रहने को
लेकर चैनल ने फीलर्स की नयी सीरिज जारी की है जिसमे दो परस्पर विरोधी चीजों की
तुलना की जा रही है और उससे ह्यूमर पैदा करने की कोशिश की जा रही है.
जाहिर है, ऐसी पंक्तियों को अकादमिक दुनिया के गलियारे में उछाला जाए तो
सांस्कृतिक पतन, भाषाई उच्छृंखलता जैसे पदबंध निकलकर आएंगे लेकिन अगर आप एफ एम
को करीब से जान-समझ रहे हैं तो सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रतिस्पर्धा
चैनलों को किन-किन इलाकों और ठिकानों पर लिटररी चोट पहचाने का काम कर रही है.
रेड एफ ने शुरु किया था- यहां आपके जमाने के गाने बजते हैं, बाप के जमाने के
नहीं. नहीं सुनना है तो अपना ईलाज करा.

इसे टक्कर देने के लिए बिग 92.7 एफ एम ने जो हिट हैं, हिट रहेंगे जैसी पंचलाइन
शुरु की और एफ एम रेडियो की भाषा बदलने की कोशिश की. अन्नू कपूर औऱ नीलेश
मिश्रा के शो एक बार फिर से उस भाषा की तरफ लौटने की अपील करते नजर आते हैं,
जिनमे एक किस्म की सादगी के साथ भी आकर्षण है.

सवाल है कि हम लगातार अपने पापा को, बुजुर्गों को गरियाकर, कमतर बताकर ही अपना
मनोरंजन कर सकते हैं ?
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