[दीवान]देखिए न ! जो गंभीर थे, वो हमारी तरह सतही हो रहे हैं

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sun Jun 9 22:56:58 CDT 2013


आज से कोई पांच-छह साल पहले साहित्य के पाठक-छात्र का ब्लॉगर होना,छिनाल हो
जाना हुआ करता था. तकनीक से आक्रांत रहे कालजयी और मठाधीश इसे घृणा से
फब्तियां कसते नजर आते. उनकी लाचारी कहें या शुक्रिया अदा करें कि इस घृणा
मिश्रित भाव के लिए कोई नया शब्द इजाद न कर सकें लेकिन व्याकुलता फिर भी बनी
रहती. कुछ बत्तख टाइप के साहित्यसेवी ऐसे मठाधीशों को पोस्टों की प्रिंटआउट
ले-ले जाकर पहुंचाते और मिलने पर मठाधीश हम जैसों से सवाल करते- सुना है जी
आजकल तुम ब्लॉग पर बहुत चैट करने लगे हो..नो सर, ब्लॉग पर चैट नहीं
होती,पोस्टें लिखी जाती है, आपको किसी ने तो पढ़वाया होगा. तब हिन्दी के इन
मठाधीशों को वर्चुअल स्पेस सीरियसली लेता नहीं था..एक अलग द्वीप बनने लगे थे
जिसके अपने कवि,कथाकार,किस्सागो और स्मृतिचित्र लिखनेवाले लोग आ रहे थे.
मीडिया से,मैनेजमेंट से, इंजीनियरिंग और दूसरे ऐसे पेशे से जिनका हिन्दी विभाग
से कोई लेना-देना नहीं था.
तब नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया के प्रस्ताव पर मैंने ब्लॉग पर
कॉलम शुरु किया जो कि विभूति-छिनाल प्रकरण के बाद एक ही राइटअप जाने के बाद इस
पत्रिका में न लिखने का मन लिया. लेकिन पहली राइटअप का शीर्षक ही दिया था-
ब्लॉगिंग जो हिन्दी विभाग की पैदाईश नहीं है.

अब जब देखता हूं कि ऐसे ही मठाधीश जिसमे कि एक मंगलेश डबराल जैसे शख्स भी हैं
फेसबुक और वर्चुअल स्पेस पर न केवल सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं, इसके
पहले इस पर मत जाहिर करने की हिम्मत जुटा चुके हैं, हंसी आती है. माना कि
वर्चुअल स्पेस और सोशल मीडिया का लेखन सतही है,कूड़ा है तो भी इतना सतही नहीं
है कि सक्रिय होने के पहले आप इसके विशेषज्ञ हो जाएं. जो भी पुराने लोग इनसे
जुड़े हैं, वो ऐसे मन्तव्य पर सिर्फ हंस भर सकते हैं. ये हिन्दी की दुनिया का
उत्तर-पहचान संकट काल है जिसमें हिन्दी विभाग के बीए प्रथम वर्ष के छात्र से
कहीं ज्यादा स्थापित, कालजयी और सरोकारी साहित्यकार अपनी पहचान और संदर्भों को
लेकर ज्यादा परेशान है. देखा नहीं पिछले दिनों विश्वनाथ त्रिपाठी ने इन्टनेट
पर के लेखन और पठन पर कैसे बउआ( रेड एफ एम का बउआ नहीं) राय दी. यहां तक कि
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष ने वही कागज-कलम छूने का सुख दोहराया. मुझे हंसी
आती है कि एकाध ब्लॉग की अतिसक्रियता ने इनकी पूरी अवधारणा और सोच को कैसे
तितर-बितर कर दिया और अच्छे भले ये शांतजीवी लोग हुलक-हुलककर वो सब कर रहे हैं
जिसके करने पर हम जैसों के प्रति मुंह सिकोड़ लेते थे. अपने लिए तो अच्छा ही
है कि बिगड़े को बिगड़े की कंपनी भी मिली और बड़े लोगों की संगत का सुख भी.
बहरहाल, नया ज्ञानोदय में छपा वो लेख एक बार फिर से-
http://www.hunkaar.com/2010/05/blog-post_06.html
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